सऊदी अरब को क्यों निशाना बना रहे हूती, क्या है दुश्मनी की वजह?
यमन में सऊदी हस्तक्षेप, धार्मिक भिन्नता और ईरान समर्थित हूती हमलों के कारण दोनों पक्षों के बीच भीषण दुश्मनी बनी हुई है, जो अब हवाई अड्डों और ऊर्जा ठिकानों तक फैल चुकी है. इस बारे में डिटेल में समझ लेते हैं.

यमन में छिड़ा भयंकर संघर्ष अब अपनी भौगोलिक सीमाओं को लांघकर पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है. हूती विद्रोहियों ने महज दो दिनों के भीतर सऊदी अरब के दो अतिसंवेदनशील हवाई अड्डों, रियाद के किंग खालिद और आभा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को निशाना बनाते हुए घातक मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं. इस भीषण सैन्य कार्रवाई में तीन बेगुनाह लोगों की जान चली गई, जबकि दर्जनों नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं.
हूतियों ने अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियों को सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल न करने की अंतिम चेतावनी जारी कर दी है. हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी के अनुसार सऊदी अरब का एयरस्पेस अब उनके सीधे निशाने पर आ चुका है, जिससे दोनों पक्षों में तनाव नए स्तर पर पहुंच गया है.
हमलों की ताजा वजह
हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के प्रमुख ठिकानों पर हमले तेज करने के पीछे हाल ही में घटी कई बड़ी घटनाएं जिम्मेदार हैं. जुलाई 2026 में यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर ईरान से आ रहे एक यात्री विमान को उतरने से रोक दिया गया था, जिसमें हूती प्रतिनिधिमंडल के सदस्य सवार थे. इस घटना के साथ ही यमन के भीतर सऊदी समर्थित सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे अभियानों ने हूतियों के गुस्से को भड़का दिया. इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानते हुए हूतियों ने जवाबी कार्रवाई के तहत सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए.
सैन्य दखल की पृष्ठभूमि
सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधे टकराव की शुरुआत साल 2014 से मानी जाती है, जब हूती विद्रोहियों ने यमन की सत्ता पर धावा बोलते हुए राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंका गया. यमन सरकार को दोबारा बहाल करने और हूतियों के तेजी से बढ़ते कदम को रोकने के लिए 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक विशाल बहुराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन बनाया गया. इस गठबंधन द्वारा यमन में किए गए निरंतर हवाई हमलों और सैन्य ऑपरेशनों ने दोनों के बीच दुश्मनी को एक कभी न खत्म होने वाली जंग में बदल दिया.
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धार्मिक और वैचारिक अंतर
इस लंबे संघर्ष के पीछे एक बहुत बड़ा वैचारिक और धार्मिक कारण भी काम कर रहा है. सऊदी अरब एक सुन्नी बहुसंख्यक राष्ट्र है और खुद को पूरी दुनिया में सुन्नी इस्लाम का प्रमुख प्रतिनिधि मानता है. इसके विपरीत, यमन के हूती विद्रोही शिया इस्लाम की अति विशिष्ट जैदी शाखा से ताल्लुक रखते हैं. इन दोनों के बीच धार्मिक सिद्धांतों, सामाजिक विचारों और शासन प्रणाली को लेकर बुनियादी मतभेद हैं, जिसके चलते ऐतिहासिक रूप से दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को रणनीतिक और धार्मिक तौर पर अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं.
ईरान से हूतियों का गठजोड़
सऊदी अरब के लिए हूती विद्रोहियों का सबसे बड़ा खतरा उनका ईरान से जुड़ाव है. हूती समूह को ईरान से भारी मात्रा में आधुनिक हथियार, बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक, घातक ड्रोन और आर्थिक सहायता प्राप्त होती है. मध्य पूर्व के कूटनीतिक नक्शे पर सऊदी अरब और ईरान एक-दूसरे के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. रियाद की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यमन की दक्षिणी सीमा पर ईरान समर्थित सशस्त्र समूह की मौजूदगी उनकी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सबसे बड़ा जोखिम है, जिसे वे किसी भी हाल में पनपने नहीं देना चाहते.
आर्थिक और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर चोट
हूती विद्रोही केवल सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी सऊदी अरब को भारी चोट पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. वे समय-समय पर सऊदी की प्रमुख तेल रिफाइनरियों, जैसे अरामको के प्रतिष्ठानों, यानबू के ऊर्जा संयंत्रों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर मिसाइलें दागते रहे हैं. इन हमलों का सीधा मकसद सऊदी अरब के राजस्व के मुख्य स्रोत तेल उत्पादन को नुकसान पहुंचाना, विदेशी निवेश को प्रभावित करना और रियाद पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बनाकर युद्धविराम के लिए मजबूर करना है.

लाल सागर पर नियंत्रण की जंग
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले लाल सागर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर वर्चस्व कायम करना भी इस संघर्ष का एक प्रमुख हिस्सा है. हूती विद्रोही इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों और तेल टैंकरों पर अपना दबदबा बनाना चाहते हैं. इस बेहद अहम समुद्री रास्ते पर खतरा पैदा करके हूती विद्रोही न केवल सऊदी अरब की वैश्विक तेल आपूर्ति लाइन को बाधित कर रहे हैं, बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अपना दबाव बनाकर विश्व समुदाय का ध्यान यमन संकट की ओर खींचना चाहते हैं.
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