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तूफान झेलने वाला प्लेन ज्वालामुखी की राख में क्यों हो जाता है ग्राउंडेड?

विमान भले ही बारिश और आंधी झेल लें, लेकिन ज्वालामुखी की राख में मौजूद पिघलने वाला सिलिका जेट इंजन को पूरी तरह बंद कर देता है. इस वजह से सुरक्षा कारणों से उड़ानें रद्द करनी पड़ती हैं.

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  • ज्वालामुखी राख हवाई उड़ानों के लिए गंभीर खतरा है।
  • इंडोनेशिया में विस्फोट से हजारों उड़ानें रद्द, यात्री फंसे।
  • राख इंजन पिघलाकर कांच बनाती, विमान पर घातक असर।
  • सुरक्षा जांच के बाद ही उड़ानें दोबारा शुरू की जाती हैं।

भीषण आंधी, तूफानी हवाओं और तेज बारिश के बीच आसानी से आसमान का सीना चीरने वाले बड़े-बड़े यात्री विमान ज्वालामुखी की राख सामने आते ही अचानक बेबस हो जाते हैं. हाल ही में इंडोनेशिया के सुंडा स्ट्रेट में स्थित ऐतिहासिक अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी में अचानक हुए भीषण विस्फोट के बाद कई दिनों के लिए हवाई यातायात पूरी तरह ठप पड़ गया. ज्वालामुखी से निकले राख के विशाल गुबारों ने हजारों फीट की ऊंचाई तक पूरे आसमान को ढक लिया, जिसके कारण सुरक्षा के लिहाज से उड़ानों को तुरंत रोकना पड़ा. सामान्य मौसम की खराबी को झेलने वाली आधुनिक एविएशन तकनीक के पास भी ज्वालामुखी की खतरनाक राख का कोई सीधा मुकाबला नहीं है. यही वजह है कि जब भी ऐसी घटना होती है, दुनिया भर की एयरलाइंस यात्रियों की जान जोखिम में डाले बिना सभी उड़ानों को तुरंत रद्द कर देती हैं.

इंडोनेशिया में विस्फोट और उड़ानों पर छाया संकट

जावा और सुमात्रा द्वीपों के मध्य स्थित अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी में तड़के 3:53 बजे महज 30 सेकंड का एक भयंकर धमाका हुआ. इंडोनेशियाई भूवैज्ञानिक एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, दो दिनों में इस पर्वत में चार बार रुक-रुक कर विस्फोट दर्ज किए गए. इस दौरान राख का पहला गुबार 20,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ा, जिससे जकार्ता, बैंटन और पश्चिमी जावा प्रभावित हुए. इसके बाद उठे दूसरे गुबार ने 50,000 फीट की ऊंचाई छूते हुए लामपुंग, बेंगकुलु और हिंद महासागर के बड़े हिस्से को अपने घेरे में ले लिया. नतीजतन, दो दिनों में कुल 2,961 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं, जिनमें 622 अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स शामिल थीं. इस आपातकाल के कारण 3.41 लाख से अधिक यात्री विभिन्न हवाई अड्डों पर फंस गए.

विमान के बाहरी हिस्सों और केबिन पर असर

सामान्य राख और ज्वालामुखी से निकलने वाले मलबे में जमीन-आसमान का फर्क होता है. इस राख में चट्टानों और खनिजों के बेहद कठोर तथा नुकीले कण शामिल होते हैं. जब 800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहा विमान इस राख के संपर्क में आता है, तो उसकी विंडस्क्रीन पर सैंडपेपर रगड़ने जैसा असर पड़ता है और शीशा पूरी तरह धुंधला हो जाता है. इससे पायलटों के लिए सामने देखना असंभव हो जाता है. इसके अलावा, यह सूक्ष्म राख कॉकपिट के बाहरी डेटा सेंसरों को ब्लॉक कर देती है, जिससे गलत स्पीड और एल्टीट्यूड रीडिंग मिलने लगती है. साथ ही, विमान के वेंटिलेशन सिस्टम में राख घुसने से केबिन के अंदर यात्रियों को सांस लेने में भारी दिक्कत होने लगती है.

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तूफान झेलने वाला प्लेन ज्वालामुखी की राख में क्यों हो जाता है ग्राउंडेड?

इंजन के अंदर कांच बनने की जानलेवा प्रक्रिया

ज्वालामुखी की राख का सबसे घातक असर जेट इंजन के अंदरूनी हिस्से पर पड़ता है. इस राख में सिलिका यानी कांच बनाने वाले तत्व की बहुत अधिक मात्रा होती है. आधुनिक विमान इंजनों का आंतरिक तापमान 1400 से 1700 डिग्री सेल्सियस तक रहता है. जैसे ही सिलिका से भरे कण इंजन के अंदर दाखिल होते हैं, वे इतनी भीषण गर्मी में तुरंत पिघलकर तरल कांच बन जाते हैं. यह पिघला हुआ कांच जब टरबाइन के ब्लेड और नोजल तक पहुंचता है, तो वहां की हवा से ठंडा होकर जम जाता है. इसके परिणामस्वरूप इंजन का वायु प्रवाह पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है और चलती उड़ान के दौरान ही जेट इंजन अचानक बंद हो जाते हैं.

वर्ष 1982 की ऐतिहासिक और खौफनाक घटना

आसमान में राख के इस साइलेंट किलर रूप का सबसे बड़ा उदाहरण 1982 में देखने को मिला था. इंडोनेशिया के ऊपर से उड़ान भर रहा ब्रिटिश एयरवेज का एक यात्री विमान अचानक ज्वालामुखी की अदृश्य राख के बादल में प्रवेश कर गया. कुछ ही मिनटों के भीतर जेट के चारों इंजनों ने काम करना बंद कर दिया और विमान तेजी से नीचे गिरने लगा. बेहद विपरीत परिस्थितियों में पायलटों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए इंजनों को हवा में रीस्टार्ट किया. यद्यपि धुंधली विंडस्क्रीन के कारण बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, फिर भी पायलटों ने विमान की सुरक्षित लैंडिंग कराकर सैकड़ों यात्रियों की जान बचा ली थी. इस घटना के बाद से ही वैश्विक विमानन जगत राख को लेकर बेहद सतर्क हो गया.


तूफान झेलने वाला प्लेन ज्वालामुखी की राख में क्यों हो जाता है ग्राउंडेड?

उड़ानें रद्द करने और शुरू करने का फैसला कौन करता है?

ज्वालामुखी फटने के बाद उड़ानों को स्थगित करने का फैसला किसी एक सरकारी आदेश पर निर्भर नहीं होता, बल्कि हर एयरलाइन का अपना ऑपरेशन्स और रिस्क असेसमेंट स्टाफ यह निर्णय लेता है. सेटेलाइट ट्रैकिंग की मदद से राख के बादल के फैलाव, हवा की रफ्तार और उसकी दिशा का लगातार विश्लेषण किया जाता है. चूंकि ऊपरी वायुमंडल में तेज हवाओं के कारण राख सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल सकती है, इसलिए कई सुरक्षा-पसंद एयरलाइंस पहले ही अपनी फ्लाइट्स कैंसिल कर देती हैं. उड़ानों को दोबारा शुरू करने से पहले इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि की जाती है कि राख का गुबार पूरी तरह छंट चुका है और ज्वालामुखी से दोबारा नया विस्फोट होने की कोई आशंका नहीं है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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