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Sports Medals History: किसी भी खेल में कब शुरू हुआ था मेडल देने का रिवाज, जानें किसने की शुरुआत?

Sports Medals History: आज के समय में सफलता को मेडल से मापा जाता है. लेकिन जब मेडल देने की परंपरा नहीं थी तब विजेताओं को कैसे सम्मानित किया जाता था. आइए जानते हैं.

Sports Medals History: आज के समय में मेडल खेल में सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक है. लेकिन मेडल देने की परंपरा हमेशा से नहीं थी. खेलों में मेडल देने की प्रथा असल में एक आधुनिक अविष्कार है. जिसकी जड़ें 19वीं सदी के आखिर में ओलंपिक खेलों के फिर से शुरू होने से जुड़ी हुई हैं. आइए जानते हैं कैसे हुई थी मेडल देने की परंपरा शुरू.

मेडल का जन्म 

मेडल देने के परंपरा आधिकारिक तौर पर 1896 के एथेंस ओलंपिक से शुरू हुई थी. ये पहले आधुनिक ओलंपिक खेल थे. हालांकि यह सिस्टम आज के सिस्टम से काफी अलग था. इस पहले इवेंट में कोई गोल्ड मेडल नहीं थे. इसके बजाय पहले स्थान पर आने वाले को सिल्वर मेडल, जैतून के टहनी और एक डिप्लोमा दिया जाता था. दूसरे स्थान पर आने वाले को तांबे या फिर ब्रोंज का मेडल दिया जाता था और तीसरे स्थान पर आने वाले को कुछ भी नहीं. 

प्राचीन समय में विजेताओं को कैसे सम्मानित किया जाता था?

प्राचीन ओलंपिक खेलों में जो 776 ईसा पूर्व में शुरू हुए थे कोई भी मेडल नहीं था. विजेताओं को जैतून की माला पहनाई जाती थी. यह ग्रीक संस्कृति में सम्मान, शांति और दैवीय कृपा का एक शक्तिशाली प्रतीक था. सार्वजनिक पहचान और जीवन भर की प्रतिष्ठा भौतिक पुरस्कारों से काफी ज्यादा मायने रखती थी.

गोल्ड सिल्वर ब्रॉन्ज सिस्टम की शुरुआत कैसे हुई?

यह तीन स्तरीय मेडल सिस्टम 1904 के सेंट लुइस ओलंपिक में संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थायी रूप से पेश किया गया था. इस फॉर्मेट के बाद दुनिया भर में इसे अपना लिया गया और यह प्रतिस्पर्धी खेलों के लिए एक स्टैंडर्ड बन गया. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने बाद में 1896 और 1900 के खेलों के विजेताओं को गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल दिए. 

किसने शुरू की थी मेडल की परंपरा?

आधुनिक ओलंपिक मेडल की परंपरा का श्रेय पियरे डी कूबर्टिन को जाता है. यह एक फ्रांसीसी शिक्षक थे जिन्होंने ओलंपिक खेलों को फिर से शुरू किया और आईओसी की स्थापना की. उनके विजन में प्राचीन ग्रीक आदर्श को आधुनिक प्रतियोगिता के साथ जोड़ा गया. पहले ओलंपिक मेडल मशहूर फ्रांसीसी मूर्तिकार जुल्स क्लेमेंट चैपलिन ने डिजाइन किए थे. इन धातुओं का चुनाव कोई संयोग नहीं था. ग्रीक पौराणिक कथाओं के मुताबिक यह क्रम इंसान के युग को दर्शाता है. स्वर्ण युग, रजत युग और कांस्य युग. स्वर्ण युग का मतलब है शांति और पूर्णता, रजत युग का मतलब है गिरावट और कांस्य युग का मतलब है संघर्ष.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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