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Chapati Movement: जब रोटी ने निभाया था भारत की आजादी में अहम किरदार, जानें कैसे कांपा था ब्रिटिश साम्राज्य?

Chapati Movement: 1857 की शुरुआत में भारत में चपाती मूवमेंट शुरू हुआ. आइए जानते हैं क्या था यह मूवमेंट और इतने ब्रिटिश साम्राज्य को कैसे हिला दिया था.

Chapati Movement: 1857 की शुरुआत में ब्रिटिश राज के खिलाफ खुली बगावत शुरू होने से महीनों पहले पूरे नॉर्थ इंडिया में कुछ अजीब होने लगा. गांव वाले एक बस्ती से दूसरी बस्ती में रोटियां भेजने लगे थे. कोई लिखा हुआ मैसेज नहीं था, कोई नारा नहीं था और कोई दिखने वाला इंस्ट्रक्शन नहीं था. इसके बावजूद भी चपातियों के इस चुपचाप सरकुलेशन ने ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन में घबराहट पैदा कर दी थी. इस किस्से को चपाती मूवमेंट के नाम से जाना जाता है.

कैसे शुरू हुआ चपाती मूवमेंट?

ऐसा कहा जाता है कि यह घटना फरवरी 1857 में शुरू हुई थी. मथुरा जैसे इलाकों के गांव में चौकीदारों को अनजान मैसेंजर से कुछ रोटियां मिलीं. उन्हें और रोटियां बनाने और उन्हें आसपास के गांव में देने का ऑर्डर दिया गया था. यह तरीका आसान लेकिन काफी असरदार था. एक यात्री जो अक्सर जंगली इलाकों से निकलता था गांव के चौकीदार को चपातियां देता था और उससे कहता था कि वह उन्हें दोबारा बनाकर आगे बांट दे. रोटी के साथ कोई भी एक्सप्लेनेशन नहीं होती थी. कुछ ही दिनों में यह आंदोलन मथुरा, फर्रुखाबाद, गुड़गांव, अवध, रोहिलखंड और दिल्ली में तेजी से फैल गया.

ब्रिटिश पोस्टल सर्विस से भी तेज 

कॉलोनियल अधिकारियों को जिस बात ने काफी परेशान किया, वह थी इसकी रफ्तार. रिपोर्ट्स बताती थी कि चपातियां एक ही रात में लगभग 300 किलोमीटर तक पहुंच जाती थी. यह उस समय के ब्रिटिश पोस्टल सिस्टम से भी तेज था. यह नेटवर्क ऑर्गेनाइज्ड लेकिन दिखाई ना देने वाला लग रहा था. रोटी पर कोई लिखा हुआ कोड, कोई पॉलिटिकल पैम्फलेट और कोई पब्लिक डिक्लेरेशन नहीं होता था. पूरी तरह जांच करने के बावजूद भी ब्रिटिश इसका मकसद नहीं समझ पाए. 

ब्रिटिश अधिकारियों ने इस आंदोलन को बगावत की जमीन तैयार करने वाला एक संभावित सीक्रेट कम्युनिकेशन सिस्टम माना. मथुरा के उस समय के मजिस्ट्रेट मार्क थॉर्नहिल ने इसे एक ऐसा एक्सपेरिमेंट बताया जिससे रहस्यमई बेचैनी पैदा हुई. इसका साइकोलॉजिकल असर काफी ज्यादा था. यह सोचकर कि हजारों गांव चुपचाप एक अनजान ऑपरेशन में हिस्सा ले रहे हैं सबसे ऊंचे एडमिनिस्ट्रेटिव लेवल पर डर फैल चुका था.

क्या यह बगावत का कोड था?

कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि चपातियां एकता और सब की तैयारी के निशानी थी. रोटी पास करना शायद इस बात का हल्का सा इशारा था कि बगावत की तैयारी चल रही है.  दूसरों का कहना है कि यह एक लॉजिस्टिक अरेंजमेंट की तरह काम करता था, शायद तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई जैसे नेताओं से जुड़ी सेनाओं के साथ बाकियों के लिए खाने की सप्लाई लाइन पक्की करने के लिए.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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