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मुगलों के जमाने में कैसे होते थे मिस्त्री, तब इन्हें कितनी मिलती थी पगार?

Mughal Era: मुगल दौर के मिस्त्री सिर्फ पत्थर नहीं तराशते थे, वे शाही सपनों को आकार देते थे. आइए जानते हैं कि उस दौर में मिस्त्री को आखिर कितने रुपये मिलते थे.

संगमरमर पर उभरती नक्काशी, गुंबदों में गूंजती हथौड़ों की आवाज और शाही खजाने से निकलती चांदी की खनक मुगल दौर की इमारतें सिर्फ पत्थरों की नहीं, बल्कि मिस्त्रियों के पसीने और हुनर की कहानी हैं. लेकिन क्या ये कारीगर महज मजदूर थे या शाही सम्मान के हकदार कलाकार? उनकी पगार कितनी थी, किसे सोना मिला और किसे सिर्फ अनाज? इतिहास के इन सवालों के जवाब चौंकाते हैं.

शाही संरक्षण में कारीगरी का स्वर्णकाल

मुगल काल में मिस्त्री केवल निर्माण मजदूर नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित कारीगर और कलाकार माने जाते थे. अकबर से लेकर शाहजहां तक, शासकों ने कला और शिल्प को राज्य की प्रतिष्ठा से जोड़ा. शाही कारखानों जिन्हें ‘बयूतात’ कहा जाता था, में कारीगरों को संगठित ढंग से काम मिलता था. इन संस्थानों की निगरानी मीर-ए-समां जैसे उच्च अधिकारी करते थे, जो कच्चे माल, मजदूरी और गुणवत्ता तीनों पर नजर रखते थे. यही वजह थी कि मुगल स्थापत्य में निरंतरता और उत्कृष्टता दिखाई देती है.

शैलियों का संगम और मिस्त्रियों की दक्षता

मुगल मिस्त्री फारसी, मध्य एशियाई और भारतीय परंपराओं के संगम में प्रशिक्षित थे. गुंबद, मेहराब, मीनार, जालीदार खिड़कियां और बारीक नक्काशी, इन सबमें उनकी महारत दिखती थी. सिर्फ वास्तुकला ही नहीं, लघु चित्रकला, रत्नजड़ित आभूषण, कपड़ा बुनाई और कशीदाकारी में भी ये कारीगर निपुण थे. मुगलई भोजन तक में शिल्प का भाव झलकता था, जहां तकनीक और स्वाद का मेल दिखाई देता है.

काम की संगठित व्यवस्था

शाही परियोजनाओं में काम विभाजन स्पष्ट था. प्रमुख वास्तुकार योजना बनाते थे, वरिष्ठ मिस्त्री तकनीकी निगरानी करते थे और सामान्य कारीगर क्रियान्वयन में जुटे रहते थे. बड़े निर्माण वर्षों तक चलते थे, इसलिए कारीगरों को स्थिर काम और नियमित भुगतान मिलता था. काम की निगरानी सख्त होती थी, क्योंकि शाही प्रतिष्ठा सीधे गुणवत्ता से जुड़ी थी.

हुनर के हिसाब से मेहनताना

मुगल काल में मिस्त्रियों की पगार एकसमान नहीं थी. यह कौशल, पद और परियोजना पर निर्भर करती थी. उच्च-स्तरीय कारीगरों और वास्तुकारों को असाधारण भुगतान मिलता था. शाहजहां के समय ताजमहल के प्रमुख वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को लगभग 10,000 रुपये वार्षिक वेतन मिलने का उल्लेख मिलता है. उस दौर में यह राशि अत्यंत बड़ी मानी जाती थी, जिसे आज के मानकों में बहुत ऊंचे वेतन के बराबर समझा जा सकता है.

सामान्य मिस्त्री और मजदूरों की स्थिति

इसके विपरीत, सामान्य मिस्त्रियों और श्रमिकों को मासिक या दैनिक मजदूरी मिलती थी. भुगतान अक्सर चांदी के सिक्कों यानी रुपयों में होता था, कई बार अनाज के रूप में भी. यह मजदूरी सीमित थी, लेकिन शाही परियोजनाओं पर लंबे समय तक काम मिलने से आय स्थिर रहती थी. बड़े निर्माणों में शामिल होने से उनकी सामाजिक स्थिति भी बेहतर होती थी और कई कारीगर धीरे-धीरे संपन्न हो जाते थे.

वेतन से आगे- नजराने और जागीर

मुगल व्यवस्था में पगार के अलावा भी आय के स्रोत थे. उत्कृष्ट काम पर कारीगरों को नजराने मिलते थे, कभी-कभी जागीर के रूप में भूमि से आय भी दी जाती थी. इससे कुछ मिस्त्री खासे समृद्ध बने. शाही संरक्षण का अर्थ केवल पैसा नहीं, बल्कि सुरक्षा, सम्मान और निरंतर काम भी था, जो उस समय बहुत मायने रखता था.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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