क्या होता है वेट बल्ब टेम्परेचर, इसका घटना इंसानों के लिए कितना खतरनाक? मौत के मुंह में जा रहा जीवन
वेट बल्ब टेम्परेचर गर्मी और हवा की नमी का संयुक्त माप है. इसका बढ़ना इंसानी पसीने के वाष्पीकरण को रोक देता है, जिससे शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने से मौत का खतरा बढ़ जाता है.

- नए शोध 30-32 डिग्री सेल्सियस को भी गंभीर खतरे का संकेत मानते हैं.
बदलते मौसम और बेलगाम होती गर्मी के बीच एक नया वैज्ञानिक शब्द तेजी से हमारी जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है, जिसे 'वेट बल्ब टेम्परेचर' कहते हैं. अक्सर लोग सिर्फ थर्मामीटर का पारा देखकर गर्मी का अंदाजा लगाते हैं, लेकिन असल खतरा हवा में छिपी उमस और तापमान के जानलेवा गठजोड़ से पैदा होता है. जब यह पैमाना एक तय सीमा को पार करता है, तो धरती पर रह रहे इंसानों का जीवन सीधे तौर पर मौत के मुंह में समाने लगता है. आइए आसान भाषा में गहराई से समझते हैं कि आखिर यह अदृश्य खतरा क्या है.
क्या है यह अनोखा तापमान पैमाना?
वेट बल्ब टेम्परेचर असल में वातावरण की गर्मी और हवा में मौजूद नमी यानी आर्द्रता को एक साथ नापने का एक खास वैज्ञानिक तरीका है. इसे मापने के लिए थर्मामीटर के निचले हिस्से (बल्ब) पर एक गीला कपड़ा लपेट दिया जाता है और फिर हवा के बहाव में तापमान दर्ज करते हैं. पानी के वाष्पीकरण यानी भाप बनकर उड़ने की प्रक्रिया से जो न्यूनतम तापमान हासिल हो सकता है, वही वेट बल्ब तापमान कहलाता है. यह सीधे तौर पर हमारे शरीर की प्राकृतिक बनावट और वातावरण के बीच के जुड़ाव को दिखाता है.
पसीने के सूखने का सीधा विज्ञान
हमारा इंसानी शरीर गर्मी के मौसम में खुद को ठंडा रखने के लिए पूरी तरह पसीने पर निर्भर करता है. जब हमें पसीना आता है और वह हवा के संपर्क में आकर सूखता है, तो हमारे शरीर का आंतरिक तापमान कम होने लगता है. सामान्य तौर पर जब हवा सूखी होती है, तो गीले कपड़े या त्वचा से पानी तेजी से उड़ता है, जिससे ठंडक पैदा होती है. ऐसी स्थिति में वेट बल्ब तापमान हमेशा हमारे साधारण थर्मामीटर में दिखने वाले 'ड्राई बल्ब' तापमान से काफी कम दर्ज किया जाता है.
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जब हवा में भर जाती है पूरी नमी
मुश्किल तब शुरू होती है जब हवा में नमी का स्तर शत-प्रतिशत यानी 100 फीसदी तक पहुंच जाता है, जिसे हम आम बोलचाल में भारी उमस कहते हैं. इस स्थिति में हवा पहले से ही पानी से इतनी संतृप्त होती है कि वह बाहर से और पानी सोख नहीं पाती, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो जाती है. जब वाष्पीकरण रुक जाता है, तो थर्मामीटर का सामान्य तापमान और गीले कपड़े वाला वेट बल्ब तापमान दोनों बिल्कुल बराबर हो जाते हैं और पसीना सूखना बंद हो जाता है.
शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होना
यदि वायुमंडल का वेट बल्ब तापमान बढ़ते-बढ़ते 35 डिग्री सेल्सियस या 95 डिग्री फारेनहाइट के स्तर तक पहुंच जाए, तो यह इंसानों के लिए एक कड़ा चक्रव्यूह बन जाता है. इस स्तर पर हवा में इतनी ज्यादा नमी जमा हो जाती है कि इंसान के शरीर से निकलने वाला पसीना हवा में विलीन ही नहीं हो पाता. जब पसीना त्वचा पर ही जमा रहेगा और सूखेगा नहीं, तो शरीर का खुद को ठंडा करने का प्राकृतिक वेंटिलेशन सिस्टम पूरी तरह क्रैश हो जाता है, जो जानलेवा साबित होता है.
शुरुआती स्तर पर ही मंडराता खतरा
मौसम वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के मुताबिक, वेट बल्ब टेम्परेचर का ग्राफ जैसे ही 29 डिग्री से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंचता है, खतरे की घंटी बज जाती है. यह शुरुआती स्तर ही समाज के सबसे संवेदनशील हिस्सों, जैसे छोटे बच्चों, बीमार लोगों और बुजुर्गों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होने लगता है. इस दौरान शरीर में पानी की भारी कमी होने लगती है और अस्पतालों में गर्मी जनित बीमारियों के कारण भर्ती होने वाले मरीजों और मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ने लगता है.
स्वस्थ इंसानों के लिए जानलेवा सीमा
तापमान का ग्राफ थोड़ा और ऊपर चढ़कर जब 32 डिग्री से 34 डिग्री सेल्सियस के दायरे में पहुंच जाता है, तो हालात बेकाबू होने लगते हैं. इस स्थिति में बेहद तंदुरुस्त और स्वस्थ इंसानों के लिए भी खुले आसमान के नीचे काम करना या किसी भी तरह का शारीरिक श्रम करना बेहद मुश्किल हो जाता है. इस जानलेवा माहौल में आधे घंटे से भी कम समय बिताना किसी भी इंसान को गंभीर रूप से बीमार करने और उसकी जान को जोखिम में डालने के लिए काफी होता है.
सहनशीलता की आखिरी दहलीज और हाइपरथर्मिया
35 डिग्री सेल्सियस का वेट बल्ब तापमान इंसानी शरीर की सहनशीलता की वो अंतिम लक्ष्मण रेखा है, जिसके आगे मौत निश्चित मानी जाती है. यदि कोई व्यक्ति इस माहौल में कुछ घंटे लगातार बिता दे, तो पसीना न सूखने की वजह से उसके शरीर का अंदरूनी तापमान खतरनाक रूप से बढ़ जाता है, जिसे विज्ञान में 'हाइपरथर्मिया' कहते हैं. इसके तुरंत बाद इंसान हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और मल्टीपल ऑर्गन फेलियर (कई अंगों का काम बंद करना) का शिकार होकर दम तोड़ देता है.
हालिया शोध और वैज्ञानिकों की कड़ी चेतावनी
पहले वैज्ञानिक सैद्धांतिक रूप से 35 डिग्री सेल्सियस को ही खतरे की आखिरी सीमा मानते थे, लेकिन नए शोधों ने बेहद डरावने तथ्य सामने रखे हैं. हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि महज 30 डिग्री से 32 डिग्री सेल्सियस का वेट बल्ब टेम्परेचर भी मानव शरीर को गंभीर तनाव और मौत के संकट में डालने के लिए पर्याप्त है. ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में अगर हमने प्रकृति को नहीं संभाला, तो बढ़ता वेट बल्ब तापमान हंसती-खेलती इंसानी आबादी को हमेशा के लिए खामोश कर देगा.
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Source: IOCL


























