CJP Protest: कैसे काम करता है आंसू गैस का गोला, पहली बार कहां हुआ था इसका प्रयोग?
CJP Protest: दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे गए. आइए जानते हैं कि आंसू गैस के गोले कैसे काम करते हैं और सबसे पहले इनका इस्तेमाल कहां हुआ था.

- इसका पहला उपयोग 1912 में फ्रांस में हुआ था।
CJP Protest: दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान आंसू गैस के गोले का इस्तेमाल किया गया. इसके बाद भीड़ को काबू करने वाले इस साधन को एक बार फिर से चर्चा में ला दिया गया. जब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों का आमना सामना हुआ तो सवाल यह उठे कि यह गोले असल में कैसे काम करते हैं, फटने पर क्या होता है और दुनिया भर में पुलिस बल इनका इतना ज्यादा इस्तेमाल क्यों करते हैं? हालांकि इसे आमतौर पर आंसू गैस कहा जाता है लेकिन तकनीकी रूप से यह कोई गैस नहीं होती. इसके बजाय इसमें ऐसे केमिकल कंपाउंड होते हैं जो कुछ समय के लिए आंख, त्वचा और सांस लेने के सिस्टम में जलन पैदा करते हैं, इससे लोगों को उस जगह से हटने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
आंसू गैस असल में गैस नहीं है
अपने प्रचलित नाम के बावजूद भी वैज्ञानिक नजरिए से आंसू गैस कोई गैस नहीं है. ज्यादातर आधुनिक आंसू गैस के गोलों में o-chlorobenzlidene malononitrile या chloroacetophenone जैसे केमिकल बारीक पाउडर या फिर लिक्विड के रूप में होते हैं. गोले के अंदर चारकोल और पोटेशियम नाइट्रेट जैसे जलने वाले पदार्थ होते हैं. जब गोला दागा जाता है तो ये पदार्थ जलने लगते हैं और केमिकल को हवा में डूबे धुएं या फिर धुंध के घने बादल के रूप में फैला देते हैं.
इंसानी शरीर पर कैसा पड़ता है असर?
गोले से निकलने वाले केमिकल कण आंख, त्वचा, नाक और सांस की नली में मौजूद दर्द महसूस करने वाले नर्व रिसेप्टर को एक्टिवेट कर देते हैं. संपर्क में आने के कुछ ही सेकंड के अंदर शरीर प्रतिक्रिया करता है और काफी ज्यादा आंसू निकलते हैं. इसी के साथ आंखों में तेज जलन, जोरदार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, त्वचा में जलन और कुछ मामलों में जी मचलना या फिर उल्टी जैसे समस्या होती है.
वैसे तो यह अनुभव काफी ज्यादा दर्दनाक होता है लेकिन इसका असर आमतौर पर कुछ समय के लिए ही रहता है. जब भी कोई व्यक्ति प्रभावित इलाके से निकलकर ताजी हवा में जाता है तो संपर्क के स्तर के आधार पर आमतौर पर 15 से 30 मिनट के अंदर लक्षण कम होने लगते हैं.
आंसू गैस का गोला कैसे दागा जाता है?
आंसू गैस के गोले खास लॉन्चर या फिर दंगा रोधी बंदूकों का इस्तेमाल करके दागे जाते हैं. टारगेट एरिया में गिरने के बाद गोला अंदर ही अंदर जलता है और कुछ समय तक लगातार केमिकल वाला धुआं छोड़ता रहता है. इससे जलन पैदा करने वाला पदार्थ बड़े इलाके में फैल जाता है. हवा की दिशा और मौसम की स्थिति इस बात को तय करने में एक बड़ी भूमिका निभाती है कि धुआं कितनी तेजी से और कितनी दूर तक जाएगा.
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आंसू गैस का इस्तेमाल सबसे पहले कहां हुआ था?
आंसू गैस का घरेलू इस्तेमाल सबसे पहले 1912 में हुआ था. उस वक्त फ्रांस की पेरिस पुलिस ने अपराधियों को काबू करने और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए एथिल ब्रोमोएसीटेट भरे ग्रेनेड का इस्तेमाल किया गया था.
इसका पहला सैन्य इस्तेमाल ठीक 2 साल बाद अगस्त 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत में हुआ था. उस वक्त फ्रांसीसी सैनिकों ने जर्मन ट्रेंच पर आंसू गैस के गोले दागे. यहीं से युद्ध के मैदान में केमिकल इरिटेंट्स का इस्तेमाल शुरू हुआ.
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