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Space Time: क्या होता है स्पेस टाइम, जानें पृथ्वी के समय से यह कितना तेज या धीरे?

Space Time: जिस तरह पृथ्वी पर समय होता है उसी तरह अंतरिक्ष का भी एक अपना अलग टाइम है. आइए जानते हैं क्या होता है स्पेस टाइम और यह पृथ्वी के समय से कैसे अलग है.

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  • जीपीएस, ब्लैक होल पर समय धीमा होने के उदाहरण हैं.

Space Time: स्पेस टाइम आधुनिक भौतिकी की सबसे दिलचस्प अवधारणाओं में से एक है. अल्बर्ट आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के मुताबिक स्पेस और टाइम अलग-अलग चीजें नहीं हैं बल्कि एक ही चार आयामी ढांचे के रूप में आपस में जुड़े हुए हैं. यह पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है. इस विचार ने गुरुत्वाकर्षण, रफ्तार और समय के बीतने के बारे में इंसानों की समझ को बदल दिया. स्पेस टाइम का एक सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि समय हर जगह एक ही रफ्तार से नहीं चलता है. 

क्या है स्पेस टाइम? 

स्पेस टाइम चार आयामों का मिश्रण है. तीन आयाम स्पेस को बताते हैं-लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई और चौथा आयाम समय है. आइंस्टीन ने बताया कि ब्रह्मांड की हर चीज इसी चार आयामी ढांचे के अंदर मौजूद है. स्थिर और कठोर होने के बजाय स्पेस टाइम एक लचीले कपड़े की तरह व्यवहार करता है जो मुड़ और खिंच सकता है.

गुरुत्वाकर्षण स्पेस टाइम को कैसे प्रभावित करता है?

स्पेस टाइम की कल्पना करने का एक उपयोगी तरीका एक खिंची हुई रबर की शीट है. जब इस शीट पर कोई भारी चीज जैसे ग्रह, तारा या फिर ब्लैक होल रखी जाती है तो यह एक गड्ढा या फिर घुमाव बनाती है. स्पेस टाइम का यही मुड़ना हमें गुरुत्वाकर्षण के रूप में महसूस होता है. गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र जितना मजबूत होगा घुमाव उतना ही ज्यादा होगा और समय के बहाव पर उसका असर भी उतना ही ज्यादा होगा.

अंतरिक्ष में समय अलग तरह से क्यों चलता है? 

रिलेटिविटी के सिद्धांत के मुताबिक समय निरपेक्ष नहीं बल्कि सापेक्ष होता है. समय के बीतने की रफ्तार दो मुख्य वजहों पर निर्भर करती है. गुरुत्वाकर्षण और गति. मजबूत गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र समय को धीमा कर देता है और कमजोर गुरुत्वाकर्षण समय को तेजी से चलने देता है. इसी तरह काफी तेज रफ्तार से यात्रा करने पर भी यात्री के लिए समय का गुजरना धीमा हो सकता है. 

जीपीएस सेटेलाइट पर समय 

समय के अंतर का एक व्यवहारिक उदाहरण पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले जीपीएस सैटेलाइट में देखा जा सकता है. क्योंकि ये सैटेलाइट पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से दूर होते हैं इस वजह से उनके लिए समय पृथ्वी की सतह की तुलना में थोड़ा तेजी से चलता है. पृथ्वी पर मौजूद घड़ियों की तुलना में इनकी घड़ियां हर दिन लगभग 38 माइक्रोसेकंड आगे हो जाती हैं. हालांकि यह अंतर काफी छोटा लगता है लेकिन अगर इसमें सुधार न किया जाए तो जीपीएस सिस्टम में हर दिन कई किलोमीटर की नेविगेशन गलतियां जमा हो जाएंगी.

ब्लैक होल के पास समय 

समय के धीमी होने का सबसे बड़ा उदाहरण ब्लैक होल के पास देखने को मिलता है. ब्लैक होल का जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण समय को काफी धीमा कर देता है. अगर कोई व्यक्ति किसी शक्तिशाली ब्लैक होल के किनारे कुछ घंटे बिताकर पृथ्वी पर वापस आता है तो वह देख सकता है कि पृथ्वी पर कई साल या फिर दशक बीत चुके हैं. जबकि उसके लिए काफी कम समय बीता है. यह घटना स्पेस-टाइम के काफी ज्यादा मुड़ने या फिर टेढ़े-मेढ़े होने का सीधा नतीजा है. 

प्रकाश की गति के करीब की गति पर समय 

अगर कोई अंतरिक्ष यान लाइट की स्पीड के 99% की रफ्तार से यात्रा कर सके तो उसमें सवार लोगों के लिए समय काफी धीरे-धीरे बीतेगा. ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बीता एक साल पृथ्वी पर बीते लगभग 7 साल के बराबर हो सकता है.  इस असर को टाइम डाइलेशन कहा जाता है.

यह भी पढ़ेंः अगर भारत का सोना नहीं लौटाएं विदेशी बैंक तो क्या होगा, कहां शिकायत कर सकता है इंडिया?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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