झारखंड के छात्रों के हाथ में शिबू सोरेन की तस्वीर क्यों, क्या है 'गुरुजी' की विरासत?
Jharkhand Students Protest: झारखंड में विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्र शिबू सोरेन की तस्वीर लेकर जा रहे हैं. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह और कौन थे शिबू सोरेन.

- भर्ती अनियमितताओं के खिलाफ हजारों छात्रों ने विधानसभा घेराव किया।
- शिबू सोरेन की तस्वीर उनके आदर्शों के प्रति सम्मान दर्शाती है।
- 'गुरुजी' शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के बड़े नेता थे।
- शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Jharkhand Students Protest: रांची में हजारों छात्र तिरंगा और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन की तस्वीर लेकर झारखंड विधानसभा की तरफ बढ़े. यह एक खास संकेत था. प्रदर्शनकारी सिर्फ एक अनुभवी नेता को याद नहीं कर रहे थे बल्कि गुरु जी की तस्वीर का इस्तेमाल करके वे उनके ऐतिहासिक योगदान के प्रति सम्मान और उनके बेटे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदा सरकार की आलोचना के बीच फर्क भी दिखा रहे थे. ये विरोध प्रदर्शन भर्ती परीक्षा, खासकर JSSC-CGL प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी से जुड़ी चिंताओं से जुड़े हैं.
छात्र शिबू सोरेन की तस्वीर क्यों ले जा रहे हैं?
विरोध कर रहे छात्रों के लिए शिबू सोरेन की तस्वीर मौजूदा जेएमएम सरकार के बिना शर्त समर्थन के बजाय झारखंड आंदोलन से जुड़े आदर्शों का प्रतीक है. उनका संदेश मूल रूप से यह है कि वह सोरेन के संघर्ष और विरासत का सम्मान करते हैं और मौजूदा प्रशासन के कामकाज में कथित कमियों का विरोध करते हैं.
इस वजह से उनकी तस्वीर का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन को एक मजबूत राजनीतिक आयाम देता है. आंदोलन की पूरी राजनीतिक विरासत को नकारने के बजाय प्रदर्शनकारी खुद को ऐसे लोगों के तौर पर पेश कर रहे हैं जो गुरुजी से जुड़े सिद्धांतों को बनाए रखने की मांग कर रहे हैं.

शिबू सोरेन कौन थे जिन्हें गुरु जी कहा जाता है?
शिबू सोरेन आमतौर पर गुरुजी या फिर दिशोम गुरु के नाम से मशहूर हैं. झारखंड राज्य आंदोलन के वे सबसे बड़े नेताओं में से एक के रूप में उभरे. उनकी राजनीति आदिवासी और मूल निवासी समुदाय के अधिकारों और जल जंगल जमीन के नारे से गहराई से जुड़ी हुई थी.
उनके राजनीतिक यात्रा झारखंड के अलग राज्य बनने से कई दशक पहले शुरू हुई. 1960 और 1970 के दशक के दौरान उन्होंने साहूकारों के खिलाफ आदिवासी समुदायों को एकजुट किया. इन साहूकारों पर ग्रामीणों का शोषण करने, जमीर पर कब्जा करने और परिवारों को कर्ज और बंधुआ मजदूरी के जाल में फंसाने का आरोप था.
यह भी पढ़ेंः अगर कोई Satellite गिर जाए तो नुकसान की जिम्मेदारी किसकी? स्पेस लॉ समझिए
धान काटो आंदोलन
शिबू सोरेन से जुड़े बड़े अभियानों में से एक धान काटो आंदोलन था. इसका निशाना ऐसी कृषि भूमि थी जिस पर कार्यकर्ताओं का मानना था कि साहूकारों ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया था. सोरेन ने आदिवासी समुदायों को ऐसी जमीनों से फसल काटने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे यह अभियान जमीन के अधिकारों के लिए एक बड़े दावे में बदल गया. उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या के बाद उनके एक्टिविज्म को खास अहमियत मिली. उनके पिता ने भी शोषणकारी प्रथाओं का विरोध किया था. व्यक्तिगत बदले की भावना से प्रतिक्रिया देने के बजाय शिबू सोरेन ने एक बड़े सामुदायिक आंदोलन को खड़ा किया.
गुरुजी नाम कैसे मिला?
सोरेन का काम सिर्फ राजनीतिक लामबंदी तक ही सीमित नहीं था. उन्होंने आदिवासी गांव में सामाजिक और शैक्षिक पहल को भी बढ़ावा दिया. इन प्रयासों में रात्रि पाठशालाएं शामिल थीं. इनका मकसद उन लोगों को शिक्षा देना था जिनकी औपचारिक स्कूली शिक्षा तक पहुंच सीमित थी. शिक्षा और सामुदायिक संगठन पर उनके जोर ने उन्हें गुरुजी जैसा प्यार भरा नाम दिलाने में मदद की. उन्होंने शराब की लत और स्थानीय चावल की बियर के काफी ज्यादा सेवन के खिलाफ भी अभियान चलाया. उनका तर्क था कि इस लत से आदिवासी समुदाय में गरीबी और कर्ज बढ़ता है.

झारखंड के निर्माण में उनकी क्या भूमिका थी?
साल 2000 में झारखंड का निर्माण शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत का सबसे बड़ा पड़ाव है. उन्होंने जन-लामबंदी, राजनीतिक अभियान और संसदीय गतिविधि के जरिए अलग राज्य की मांग को जिंदा रखा. कई दशक के आंदोलन और राजनीतिक बातचीत के बाद 15 नवंबर 2000 को (जो आदिवासी आइकन बिरसा मुंडा की जयंती है) आधिकारिक तौर पर झारखंड का गठन हुआ. बिहार से अलग होकर यह भारत का 28वां राज्य बन गया. इस वजह से कई समर्थकों के लिए सोरेन सिर्फ जेएमएम कहीं नहीं बल्कि उस लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का भी प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके नतीजे में यह राज्य बना.
यह भी पढ़ेंः ममता बनर्जी को कौन सी सिक्योरिटी मिली है, इसका कौन उठाता है खर्चा?
























