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वोटर आईडी बनाने से लेकर चुनाव तक... कैसे काम करता है BLO, जानें कितना होता है काम का दबाव?

Death Of BLO: चुनाव की सबसे छोटी लेकिन सबसे अहम कड़ी BLO पर सबसे ज्यादा बोझ चुनाव के वक्त तो होता ही है, लेकिन चुनाव से पहले भी होता है. आइए जानें कि वे कैसे काम करते हैं.

स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) अभियान इस समय देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तेजी से चल रहा है, लेकिन इसके बीच बूथ लेवल अफसरों की लगातार हो रही मौतों ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया है. 21 नवंबर की रात से 22 नवंबर के बीच मध्य प्रदेश में भी दो बीएलओ की मौत अचानक तबीयत बिगड़ने के चलते हो गई. मृतक कर्मचारियों के परिवारों का कहना है कि अत्यधिक काम, दबाव और लक्ष्य जल्द पूरा करने की मजबूरी ही इन मौतों की वजह बनी है. 

BLO… वह व्यक्ति होता है जो हर घर का दरवाजा खटखटाता है, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ता है, हटाता है, गलतियां सुधारता है और चुनाव के दिन तक अनगिनत दबाव झेलता है. आइए जानें कि आखिर कैसे चलता है उसका पूरा सिस्टम और उस पर कितना काम का बोझ होता है?

कौन चुने जाते हैं BLO

BLO की जिम्मेदारियां चुनाव आयोग द्वारा तय की जाती हैं, और इन्हें आमतौर पर स्थानीय शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, पंचायत कर्मचारी या फिर सरकारी विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों में से चुना जाता है. इनका काम सिर्फ नाम जोड़ना या हटाना ही नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि इलाके का हर योग्य नागरिक वोटर लिस्ट में दर्ज हो, और कोई भी फर्जी नाम या दोहरी प्रविष्टि मतदाता सूची को गड़बड़ न कर दे. 

बीएलओ का सबसे कठिन काम

BLO का सबसे कठिन चरण शुरू होता है जब नया मतदाता पहचान पत्र बनाना हो. इसके लिए उन्हें घर-घर जाकर सत्यापन करना पड़ता है. पता बदलने, परिवार में नई एंट्री होने, किसी की मृत्यु होने, या किसी भी नागरिक के उम्र पूरी करने पर BLO को फॉर्म-6, फॉर्म-7, फॉर्म-8 जैसी प्रविष्टियों को संभालना पड़ता है. ये काम आसान नहीं होता, क्योंकि हर दस्तावेज की जांच, मोबाइल एप्लिकेशन में उसका अपलोड और फिर बूथ स्तर पर उसकी पुष्टि, यह सारी जिम्मेदारी बीएलओ की होती है.

क्या-क्या आती हैं समस्याएं

चुनाव आयोग के कई ऐप्स जैसे GARUDA, BLO App, ERONET, इनके रोजमर्रा के काम का जरूरी हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इन ऐप्स की तकनीकी दिक्कतें भी अक्सर उनका काम बढ़ा देती हैं. कई BLO बताते हैं कि कभी नेटवर्क नहीं मिलता, कभी सर्वर डाउन रहता है और कभी डेटा अपलोड नहीं होता है. फिर भी उन्हें तय समय में काम पूरा करना ही होता है, क्योंकि चुनाव आयोग की डेडलाइन बेहद सख्त होती है. 

चुनाव से पहली ही बढ़ जाता है काम का प्रेशर

सबसे दिलचस्प बात यह है कि BLO का काम साल भर चलता है. लोग समझते हैं कि चुनाव से ठीक पहले यह काम बढ़ता होगा, लेकिन सच यह है कि चुनाव घोषणा के महीनों पहले ही BLO की व्यस्तता चरम पर पहुंच जाती है. विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानि SIR के दौरान BLO को स्कूलों, कॉलेजों, मोहल्लों में लगातार कैंप लगाने पड़ते हैं. उन्हें सुनिश्चित करना होता है कि हर 18 साल का हुआ युवक-युवती वोटर बने, हर बूढ़ा व्यक्ति लिस्ट में बना रहे, और कोई भी गलत या काल्पनिक नाम छूट न जाए.

हर चीज पर बारीकी से रखनी होती है नजर

चुनाव नजदीक आते ही BLO पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है. उन्हें मतदान केंद्रों की स्थिति की जांच करनी होती है, दिव्यांग मतदाताओं की सूची तैयार करनी होती है, बूथों के रास्तों की मैपिंग करनी होती है और ECI की हर गाइडलाइन को लागू करवाना पड़ता है. मतदान वाले दिन BLO को सुबह-सुबह बूथ पर मौजूद रहकर यह देखना होता है कि मतदान केंद्र का सेटअप सही है या नहीं. कई बार वे पूरे दिन ड्यूटी पर रहते हैं और देर रात तक रिपोर्टिंग करते हैं.

क्या मिलती हैं सुविधाएं

BLO को मिलने वाली सुविधाओं की बात करें तो अक्सर यह मुद्दा उठता है कि उनके ऊपर काम का दबाव बहुत ज्यादा होता है, लेकिन सुविधा बहुत कम. न उन्हें ठीक से यात्रा भत्ता मिलता है, न मोबाइल रिचार्ज का खर्च, न कागज-पेन की लागत. कई BLO बताते हैं कि उन्हें अपनी जेब से पैसे खर्च कर मतदाता सूची तैयार करनी पड़ती है. कई बार रात-दिन काम करने के बावजूद उन्हें कोई अतिरिक्त मानदेय नहीं मिल पाता है. 

सबसे बड़ी समस्या यह है कि BLO अक्सर ग्रामीण इलाकों में अकेले ही बड़े-बड़े इलाकों का जिम्मा संभालते हैं. हजारों घर, अलग-अलग बस्तियां, दूर-दराज की गलियां, सब उन्हें ही कवर करनी होती हैं. गर्मी में घर-घर जाना, बारिश में गांव-गांव पहुंचना और सर्दी में सुबह-सुबह बूथ की जांच करना, यह रूटीन उनकी नौकरी का हिस्सा है. 

हर गलती का ठीकरा BLO  के सिर

इसके बावजूद BLO की भूमिका को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए, जबकि मतदाता सूची की हर गलती का ठीकरा भी अक्सर उन्हीं के सिर फोड़ दिया जाता है. यह सच है कि BLO लोकतंत्र की सबसे नीचे की, लेकिन सबसे निर्णायक ईंट है. उसकी मेहनत से ही तय होता है कि मतदाता सूची कितनी साफ, सही और विश्वसनीय है. जितना ईमानदारी और मेहनत से BLO अपना काम करता है, उतना ही पारदर्शी और भरोसेमंद चुनाव का परिणाम बनता है. 

यह भी पढ़ें: 1995 में पहली बार भारत आया था इंटरनेट! उससे पहले कैसे काम करता था ISRO?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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