राजस्थान का वह मंदिर जहां हिंदू-मुस्लिम साथ करते हैं पूजा, जानिए क्या है इसका इतिहास?
यह सभी को पता है कि मंदिर हमेशा से हिंदुओं का पूजा स्थान रहा है, जहां पर वे भगवान के सामने सिर झुकाते हैं. लेकिन राजस्थान में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पूजा करते हैं.

भारत में कई मजहब के लोग रहते हैं, जो कि अपने-अपने धर्म के ईश्वर और आस्था में विश्वास करते हैं. हिंदू मंदिर जाते हैं, मुस्लिम मस्जिद, क्रिश्चियन चर्च तो वहीं सिख गुरुद्वारे में शीश झुकाते हैं. लेकिन भारत में एक ऐसा अनोखा धाम भी है, जहां मजहब की सारी दीवारें टूट जाती हैं और दिल सिर्फ इंसानियत की भाषा बोलता है. राजस्थान के सुदूर गांव में स्थित एक देवस्थान सदियों से कौमी एकता की सबसे बड़ी मिसाल बना हुआ है. इस पावन चौखट पर हर दिन जो नजारा दिखता है, वह समाज को जोड़ने और नफरत मिटाने का संदेश है. यहां पर माता के जयकारों के बीच में मुस्लिम समाज की अकीदत भी शिद्दत के साथ महसूस की जाती है. चलिए इस मंदिर के बारे में जानें.
आस्था का अनोखा माता का मंदिर
राजस्थान के जोधपुर जिले के ग्रामीण अंचल में बसा भोपालगढ़ का बागोरिया गांव अपनी एक खास पहचान रखता है. यहां की ऊंची पहाड़ी पर माता रानी का मंदिर बना हुआ है, जहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. इस ऊंचाई पर स्थित दरबार में रोजाना सैकड़ों भक्तों का तांता लगता है. इस धाम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के सिर झुकाते हैं. जहां हिंदू पूरी श्रद्धा के साथ आरती करते हैं तो वहीं मुस्लिम भी मन्नत मांगते हैं.
मुस्लिम परिवार के कंधों पर है पूजा की जिम्मेदारी
इस प्राचीन मंदिर की सेवा और पूजा-अर्चना का जिम्मा एक मुस्लिम परिवार के कंधों पर है. कहा जाता है कि इस वक्त जलालुद्दीन खां यहां के मुख्य पुजारी हैं. कहते हैं कि सैकड़ों साल पहले उनके पूर्वज सिंध (पाकिस्तान) से भारत आए थे और यहीं के होकर रह गए. तब से लेकर आज तक उनका परिवार पीढ़ी पूरी निष्ठा के साथ मां दुर्गा की सेवा में लीन है. गांव के लोग भी इस व्यवस्था का पूरा सम्मान करते हैं और दोनों समुदायों के बीच कभी कोई मनमुटाव नहीं देखा गया.
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पीढ़ियों से जारी है सेवा
इस मंदिर के इतिहास और इसकी स्थापना के पीछे दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है. सदियों पहले जब सिंध से मुस्लिम व्यापारियों का काफिला इस रास्ते से गुजर रहा था, तब उनमें से एक व्यापारी रास्ता भटक कर यहीं छूट गया था. वह कड़कड़ाती धूप में भूख-प्यास से तड़प रहा था और उसकी जान जाने ही वाली थी, तभी इस पहाड़ी पर मां दुर्गा की असीम कृपा से उसकी जान बच गई. मां के इस साक्षात चमत्कार से अभिभूत होकर उस व्यापारी ने वापस न लौटने का फैसला किया.
चमत्कार से जुड़ा इतिहास
जान बचाने के बाद वह मुस्लिम व्यापारी इसी पहाड़ी पर रुक गया और उसने अपना पूरा जीवन मां दुर्गा की साधना और सेवा में समर्पित कर दिया. समय के साथ उसने यहां माता की पूजा शुरू की, जो आज एक अटूट परंपरा बन गई है. आद सदियों के बाद भी उस व्यापारी के वंशज उसी निष्ठा और पवित्रता के साथ मंदिर की व्यवस्था और पूजा संभाल रहे हैं.
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