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नेपाल में कितने राजनीतिक ग्रुप, कौन लोकतंत्र का समर्थक और कौन राजशाही का तलबगार?

नेपाल में 17 वर्षों में 10 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं. भ्रष्टाचार, अवसरवाद, सत्ता की भूख, और दलों में गुटबाजी ने जनता के विश्वास को तोड़ दिया है. इसके कारण राजशाही की मांग फिर से उठ रही है.

नेपाल आज एक गहरे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है. सोशल मीडिया पर बैन और बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने युवाओं में आक्रोश पैदा कर दिया है, जिसके चलते देशभर में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि 20 से अधिक जानें जा चुकी हैं और सरकार को सेना तक बुलानी पड़ी है. इसके बाद नेपाल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों को इस्तीफा देना पड़ा है, जिसके बाद नेपाल में तख्तापलट हो चुका है. 

यह सब उस देश में हो रहा है जिसने 2008 में 240 साल पुरानी राजशाही को समाप्त कर लोकतंत्र की राह चुनी थी. हालांकि, लोकतंत्र की स्थापना के बाद भी न तो राजनीतिक स्थिरता आई, न ही आम जनता के जीवन में कोई विशेष सुधार. नेपाल में 17 वर्षों में 10 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं. भ्रष्टाचार, अवसरवाद, सत्ता की भूख, और दलों में गुटबाजी ने जनता के विश्वास को तोड़ दिया है. इसके कारण राजशाही की मांग फिर से उठ रही है. ऐसे में चलिए जानते हैं कि नेपाल में कितने राजनीतिक ग्रुप हैं, कौन लोकतंत्र का समर्थक है और कौन राजशाही समर्थन कर रहे हैं. 

नेपाल का राजनीतिक इतिहास

नेपाल में 240 साल तक राजशाही रही. 1768 में पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को एकजुट किया और उसके बाद से शाह वंश के राजा नेपाल पर राज करते आए. लेकिन समय के साथ लोगों की सोच बदली, लोकतंत्र की चाह बढ़ी, जिसके चलते 2006 के जन-आंदोलन और माओवादी संघर्ष के बाद, 2008 में नेपाल से राजशाही पूरी तरह समाप्त कर दी गई. अब नेपाल एक संघीय, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बन चुका है. हालांकि, 15 साल बाद हालात फिर बदलते दिख रहे हैं. नेपाल में कुछ लोग फिर से राजशाही की वापसी की मांग कर रहे हैं और देश में लोकतंत्र और राजशाही की बहस तेज हो गई है. 

नेपाल में कितने राजनीतिक ग्रुप और कौन लोकतंत्र का समर्थक

2008 में जब नेपाल में राजशाही खत्म हुई, तब कई पार्टियों ने लोकतंत्र की स्थापना और रक्षा में अहम भूमिका निभाई. इनमें सबसे प्रमुख नेपाली कांग्रेस है, ये नेपाल की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक पार्टी है. 1950 के दशक से ही इस पार्टी ने राजशाही के खिलाफ लोकतंत्र की आवाज उठाई थी. वर्तमान में यह पार्टी गठबंधन सरकार की अगुवाई कर रही है.  इसके बाद सीपीएन-यूएमएल, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी का नाम आता है. यह पार्टी भी लोकतांत्रिक संविधान का समर्थन करती है, हालांकि कई बार इसकी राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठे हैं. जनता के बीच लोकप्रियता बनी हुई है और यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी मानी जाती है. 

वहीं नेपाल में सीपीएन का नाम भी काफी आगे रहता है. माओवादियों ने 1996 से 2006 तक नेपाल में सशस्त्र संघर्ष किया था, जिससे राजशाही कमजोर हुई. 2006 में शांति समझौते के बाद माओवादी मुख्यधारा की राजनीति में आए और लोकतांत्रिक संविधान के समर्थन में खड़े हुए. इनके अलावा जनता समाजवादी पार्टी, यूनिफाइड सोशलिस्ट और अन्य राजनीतिक ग्रूप भी शामिल हैं. इन सभी पार्टियों ने 2015 में नया संविधान बनवाया, जिसमें नेपाल को गणराज्य, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और संघीय लोकतंत्र घोषित किया गया. 

कौन कर रहा है राजशाही की वापसी की मांग?

नेपाल में मौजूदा लोकतांत्रिक शासन से निराश होकर अब एक बार फिर कुछ लोग और संगठन राजा वापस आओ, देश बचाओ के नारे लगाने लगे हैं. इन मांगों के पीछे कुछ प्रमुख लोग और संगठन हैं. जैसे राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, यह एकमात्र राजनीतिक पार्टी है जो राजशाही और हिंदू राष्ट्र की वापसी की खुलकर मांग करती है. यह चाहती है कि नेपाल फिर से 1991 वाला संविधान अपनाए, जिसमें राजा और बहुदलीय लोकतंत्र दोनों थे.

इसके अलावा संयुक्त जन आंदोलन समिति का नाम भी शामिल है. यह एक सामाजिक संगठन जिसने हाल ही में उग्र प्रदर्शन शुरू किए हैं. इनकी मांगें हैं कि 1991 का संविधान बहाल किया जाए, नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाया जाए और संवैधानिक राजशाही को फिर से लाया जाए. साथ ही राजशाही समर्थक आम नागरिक और धार्मिक समूह भी राजशाही की वापसी की मांग करते हैं. कुछ नागरिक और धार्मिक संगठनों को लगता है कि लोकतंत्र से सिर्फ भ्रष्टाचार, अस्थिरता और आर्थिक बदहाली आई है. उन्हें लगता है कि राजशाही के समय देश में स्थिरता और शांति थी. 

यह भी पढ़ें : नेपाल से पहले इन देशों में भी युवाओं ने उखाड़ फेंकी सत्ता, भारत के दो पड़ोसी देशों में भी ऐसे ही हुआ था तख्तापलट

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