बिना नागरिकता लिए भारतीय सेना में कैसे शामिल हो जाते हैं नेपाली गोरखा, क्या है कानून?
Nepali Gorkhas in Indian Army: नेपाल में बाढ़ कहर मचा रही है. इसी बीच आइए जानते हैं नेपाल के गोरखाओं के इतिहास के बारे में.

- भारतीय सेना में नेपाली गोरखा बिना नागरिकता बदले सेवा करते हैं।
- 1947 त्रिपक्षीय समझौते ने उनके लिए समान वेतन-पेंशन सुनिश्चित की थी।
- अग्निपथ योजना (2022) ने पारंपरिक भर्ती व्यवस्था को चुनौती दी।
- नेपाल की आपत्ति के कारण नई गोरखा भर्ती रुकी हुई है।
Nepali Gorkhas in Indian Army: भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की सेवा एक लंबा और शानदार इतिहास रहा है. हालांकि इस वक्त नेपाल बाढ़ की मार झेल रहा है. आपको बता दें कि नेपाली गोरखा की भर्ती की एक खास बात यह है कि वह भारतीय नागरिकता लिए बिना भी भारतीय सेना में सेवा कर सकते हैं. उनकी सेवा भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए ऐतिहासिक समझौतों और दोनों देशों के बीच खास रिश्तों पर आधारित है. गोरखा भर्ती की शुरुआत दो सदी से भी पहले हुई थी. नेपाली नागरिक अपनी नेपाली नागरिकता बनाए रखते हुए गोरखा रेजीमेंट में भर्ती होते रहे हैं.
1947 का त्रिपक्षीय समझौता
भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती का कानूनी और ऐतिहासिक आधार भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच 1947 में हुआ त्रिपक्षीय समझौता है. भारत की आजादी के बाद पूर्व ब्रिटिश भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट को भारत और ब्रिटेन के बीच बांट दिया गया था. इस समझौते में दोनों देशों की सेनाओं में नेपाली गोरखाओं की सेवा से जुड़ी शर्तें तय की गई.
इसकी एक जरूरी शर्त यह थी कि भारतीय सेना में सेवा करने वाले नेपाली गोरखाओं को भारतीय सैनिकों के बराबर ही वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवा से जुड़े दूसरे लाभ मिलेंगे. इस व्यवस्था से नेपाली नागरिकों को भारतीय नागरिक बने बिना भारत की सेना में सेवा करने का मौका मिला. इस वजह से उनकी सैन्य सेवा से उनकी राष्ट्रीयता अपने आप नहीं बदली.

गोरखा भर्ती की शुरुआत कैसे हुई?
गोरखा सैन्य सेवा का इतिहास भारत की आजादी से एक सदी से भी ज्यादा पुराना है. 1816 में सुगौली की संधि और एंग्लो नेपाली युद्ध के बाद नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रिश्ते में काफी बदलाव आया. गोरखा सैनिकों की लड़ने की क्षमता और अनुशासन से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती करना शुरू कर दिया. यह परंपरा ब्रिटिश शासन के दौरान जारी रही और बाद में आजाद भारत ने भी इसे आगे बढ़ाया.
खुली सीमा से क्या मदद मिलती है?
भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा वाला एक खास रिश्ता है. दोनों देशों के नागरिक आमतौर पर बिना किसी वीजा के एक दूसरे के देश में आ-जा सकते हैं. इसी के साथ ज्यादातर विदेशी नागरिकों के लिए वीजा की जरूरत होती है. इस वजह से नेपाली नागरिकों के लिए रोजगार, शिक्षा और सैन्य भर्ती के लिए भारत आना आसान रहा है.
लागू नियम के तहत नेपाली नागरिक भारतीय सशस्त्र बलों में भर्ती के मौके के लिए भी योग्य रहे हैं. ऐतिहासिक रूप से गोरखाओं ने योग्यता और भर्ती की शर्तों के आधार पर सैनिक से लेकर कमीशन प्राप्त अधिकारी तक के अलग-अलग स्तरों पर सेवा की है. हालांकि खुली सीमा का यह मतलब नहीं होता कि नेपाली नागरिक अपने आप भारतीय नागरिक बन जाते हैं. भारतीय सेना में सेवा करने वाला नेपाली गोरखा अपनी नेपाली नागरिकता को बनाए रख सकता है.

अग्निपथ स्कीम के बाद क्या बदला?
2022 में भारत द्वारा अग्निपथ भर्ती स्कीम शुरू किए जाने के बाद से पारंपरिक भर्ती व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती आई. इस स्कीम के तहत अग्निवीरों को आमतौर पर 4 साल के समय के लिए भर्ती किया जाता है.. बाद में हर बैच के सिर्फ कुछ लोगों को ही लंबी सेवा के लिए रखा जाता है. इसी के साथ 4 साल बाद नौकरी छोड़ने वालों को पूरी सैन्य सेवा से जुड़ी पारंपरिक पेंशन नहीं दी जाती. इससे नेपाल में चिंता पैदा हुई क्योंकि गोरखा सैनिकों से जुड़ी पुरानी व्यवस्था लंबे समय तक सैन्य सेवा और पेंशन लाभ पर आधारित थी.
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नेपाल ने आपत्ति क्यों जताई?
नेपाली सरकार ने अग्निपथ सिस्टम के तहत अपने नागरिकों की भर्ती पर आपत्ति जताई. उनका यह तर्क है कि नई व्यवस्था 1947 के त्रिपक्षीय समझौते की भावना के अनुरूप नहीं है. चिंता मुख्य रूप से 4 साल के कार्यकाल और अग्नि वीर सेवा पूरी करने के बाद नौकरी छोड़ने वालों के लिए पारंपरिक पेंशन न होने को लेकर है. यही वजह है कि इस असहमति के बीच भारतीय सेना में नई नेपाली गोरखाओं की भर्ती रुकी हुई है.
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