हिमालय से सटे क्षेत्रों में बार-बार क्यों आती है तबाही, क्या है इसके पीछे की वजह?
Himalayas Disasters: नेपाल में बाढ़ इस वक्त तबाही मचा रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि हिमालय से सटे क्षेत्र में बार-बार बढ़ क्यों आती है, इसका सबसे बड़ा कारण क्या है.

- हिमालयी क्षेत्र भौगोलिक रूप से सक्रिय, भूकंप और भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है।
- तीव्र ढलानें, भारी बारिश अचानक बाढ़ व भूस्खलन बढ़ाती हैं।
- जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलना व बादल फटना आपदाएँ बढ़ा रहे।
Himalayas Disasters: नेपाल इस वक्त बाढ़ से ग्रस्त है. वैसे तो हिमालय अपने मनमोहन परिदृश्य के लिए जाना जाता है लेकिन वही पहाड़ आसपास के क्षेत्र को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति काफी ज्यादा संवेदनशील भी बना देते हैं. बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, भूकंप और दूसरी आपदाएं अक्सर हिमालय पर्वतमाला के आसपास के क्षेत्र को प्रभावित कर देती हैं. हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ ने एक बार फिर इन पहाड़ों में रहने वाले समुदायों के सामने आने वाले खतरों को दर्शाया है.
हिमालय भौगोलिक दृष्टि से नाजुक है
हिमालय दुनिया की सबसे युवा प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है. इनका निर्माण भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के लगातार टकराव से हुआ है. यह प्लेट अभी भी एक दूसरे की तरफ बढ़ रही हैं. यही वजह है कि हिमालय क्षेत्र टेक्निक रूप से काफी ज्यादा सक्रिय और भूकंप के प्रति संवेदनशील हो गया है.
इन प्लेट की रफ्तार लगातार पहाड़ों के नीचे भू वैज्ञानिक तनाव पैदा करती है. यही वजह है कि हिमालय क्षेत्र के कई हिस्से भारत की उच्च भूकंपीय जोखिम श्रेणी, खास तौर से भूकंपीय क्षेत्र IV और V में आते हैं.
युवा भू वैज्ञानिक संरचना का मतलब यह भी है कि कई पहाड़ी ढलनों में ढीली मिट्टी, अजीब तरह की चट्टानें और अस्थिर तलछट शामिल हैं. तेज बारिश के दौरान यह सामग्री तेजी से नीचे की तरफ खिसक सकती हैं. इससे भूस्खलन हो सकता है.

खड़ी ढलानें पहाड़ को और ज्यादा विनाशकारी बनाती हैं
एक दूसरी प्रमुख भौगोलिक वजह खड़ी भूभाग है. हिमालय के पहाड़ों में गहरी घाटियां और तीव्र ढलान हैं. जब भारी बारिश होती है तब पानी तेजी से इन्हीं ढलनों के नीचे संकीर्ण नदी चैनलों में चला जाता है.
यही वजह है कि तीव्र वर्षा चट्टान, कीचड़, पेड़ और दूसरे मलबे को लेकर अचानक बाढ़ में बदल सकती है. संकरी घाटियों में ऐसे पानी का वेग काफी कम समय में सड़क, पुल, घर और दूसरे बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है.
जलवायु परिवर्तन से खतरा बढ़ रहा
ग्लोबल वार्मिंग पहले से ही नाजुक पर्यावरण पर खतरे की एक और परत को जोड़ रही है. हिमालय को अक्सर तीसरा ध्रुव कहा जाता है क्योंकि इसमें ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर भारी मात्रा में बर्फ मौजूद है. बढ़ते तापमान की वजह से ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और जमी हुई जमीन और पहाड़ी ढलनों के स्थिरता बदल रही है.

ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा
ग्लेशियर का पिघलना हिमनद जिलों के निर्माण और विस्तार में भी योगदान दे सकते हैं. जब ऐसी झील को रोकने वाली कोई प्राकृतिक बाधा पानी के दबाव, भूस्खलन या बर्फ और मलबे हटाने की वजह से विफल हो जाती है तो काफी ज्यादा मात्रा में पानी अचानक नीचे की तरफ बहने लगता है.
इस घटना को ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड के रूप में जाना जाता है. ऐसी बाढ़ निचली घाटियों में बड़े पैमाने पर विनाश की वजह बन सकती हैं. खासकर जहां बस्ती और बुनियादी ढांचे नदी के करीब बसे हैं.
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काफी ज्यादा बारिश और बादल फटना
मौसम का बदलता मिजाज एक और बड़ी चिंता का विषय है. बादल फटने से एक छोटी अवधि के अंदर एक छोटे से क्षेत्र में काफी बड़ी मात्रा में बारिश हो सकती है. पहाड़ी इलाकों में यह तेज बारिश एक साथ कई खतरों को जन्म दे सकती है. भूस्खलन, मलबा प्रवाह और अचानक बाढ़. नदी तेजी से बढ़ सकती हैं और अस्थिर ढलान अतिरिक्त जल भार की वजह से ढह सकते हैं.
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