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संसद में हंगामा और नेहरू को लेकर अपशब्द, संसदीय कार्रवाई से कैसे हटती हैं ये बातें?

बीते दिन संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने चर्चा के दौरान ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जो कि असंसदीय थे और संसदीय कार्रवाई से उनको हटा दिया गया है.

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  • हटाये गए शब्दों का मीडिया प्रसारण या रिपोर्टिंग वर्जित।

आज से सावन का महीना शुरू हो चुका है, लेकिन लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में राजनीति गरमाई हुई है. सत्र शुरू होने पर विपक्षी दलों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी को लेकर घेरा था. हालांकि उन्होंने इस्तीफा भी दे दिया, लेकिन विपक्ष है कि शांत होने का नाम नहीं ले रहा है. अब बीते दिन लोकसभा में कार्रवाई के वक्त राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और निशिकांत दुबे ने ऐसा कुछ विवादित कहा है, जिसे कि संसद के भीतर असंसदीय या अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना कहा जा रहा है. इस दौरान सदन में खूब हंगामा हुआ और उन शब्दों को सदन की कार्रवाई से हटाने का निर्देश दे दिया गया. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर संसदीय कार्रवाई से ऐसी बातें कैसे हटती हैं, चलिए जानें.

सदन में जुबानी संग्राम

लोकसभा में एंटी पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान उस वक्त जबर्दस्त हंगामा देखने को मिला जब विपक्षी सांसदों और सत्ता पक्ष के नेताओं के बीच जुबानी जंग तीखी हो गई. देश भर के युवाओं और छात्रों के भविष्य से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर बहस के दौरान सदन का माहौल अचानक से गर्म हो गया. दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे पर संसदीय मर्यादाओं को लांघने के गंभीर आरोप लगाए. इस दौरान सत्ता पक्ष के सांसदों ने विपक्षी भाषणों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया, जिसके बाद सदन की कार्यवाही में भारी व्यवधान देखने को मिला.

संसदीय रिकॉर्ड से कैसे हटते हैं असंसदीय शब्द?

जब भी कोई सांसद सदन में अमर्यादित, अशोभनीय या असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करता है, तो स्पीकर उन शब्दों को कार्यवाही से हटाने का निर्देश देते हैं. इस पूरी प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में एक्सपंक्शन Expunction कहा जाता है. इसका सीधा अर्थ यह होता है कि हटाए गए शब्द अब संसद के किसी भी आधिकारिक दस्तावेज या फिर कार्रवाई का हिस्सा नहीं रहेंगे. शब्दों के हटाने के बाद कोई भी मीडिया उन विशिष्ट शब्दों का प्रयोग या फिर प्रसारण नहीं कर सकता है.

यह भी पढ़ें: संसद में बोलने के लिए कितना मिलता है वक्त, यह कैसे होता है तय?


संसद में हंगामा और नेहरू को लेकर अपशब्द, संसदीय कार्रवाई से कैसे हटती हैं ये बातें?

लोकसभा के नियम और अधिकार

  • लोकसभा के नियमों के अंतर्गत अध्यक्ष को यह सर्वाधिकार प्राप्त हैं कि वे सदन की गरिमा को बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाएं. 
  • लोकसभा में कार्रवाई नियम 380 के तहत अगर कोई शब्द अपमानजनक या असंसदीय पाया जाता है, तो अध्यक्ष उसे हटाने का आदेश जारी करते हैं. 
  • लोकसभा नियम 381 के अनुसार, लिखित रिकॉर्ड में उन शब्दों के स्थान पर एक विशेष निशान (Asterisks *) लगा दिया जाता है और नीचे फुटनोट में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाता है कि ये शब्द पीठासीन अधिकारी के आदेश पर हटा दिए गए हैं.

राज्यसभा में क्या है नियम और प्रक्रिया?

  • संसद के उच्च सदन राज्यसभा में भी इसी तरह से अमर्यादित भाषा को रोकने के लिए स्पष्ट तौर पर नियम तय किए गए हैं. 
  • राज्यसभा नियमावली के नियम 261 के तहत सभापति को यह विवेकाधीन शक्ति प्राप्त है कि वे किसी भी आपत्तिजनक टिप्पणी को रिकॉर्ड से बाहर कर सकते हैं.
  • वहीं नियम 262 के तहत हटाई गई टिप्पणियों का प्रबंधन और दस्तावेजीकरण किया जाता है. दोनों सदनों में पीठासीन अधिकारियों का फैसला अंतिम और सर्वमान्य होता है, जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती है.


    संसद में हंगामा और नेहरू को लेकर अपशब्द, संसदीय कार्रवाई से कैसे हटती हैं ये बातें?

क्या है अमर्यादित शब्दों को हटाने की प्रक्रिया?

  • रिपोर्टिंग टीम की सतर्कता:

संसद की कार्रवाही के दौरान जब भी कोई सदस्य अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करता है, तो वहां मौजूद रिपोर्टिंग और एडिटिंग टीप तुरंत हरकत में आ जाती है. यह टीम नियम-पुस्तिका के आधार पर पूरे प्रसंद की समीक्षा करती है और आपत्तिजनक शब्दों को चिन्हित करके अपनी सिफारिश पीठासीन अधिकारी को सौंपती है.

  • लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति का निर्णय

रिपोर्ट मिल जाने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति उस बयान के पूरे संदर्भ और मंशा का बारीकी से आकलन करते हैं. अगर वे सहमत होते हैं कि इस्तेमाल की गई शब्दावली सदन की गरिमा के खिलाफ है, तो वे उसे विलोपित करने का आधिकारिक आदेश देते हैं.

  • लिखित और डिजिटल इतिहास से हमेशा के लिए मिटाना

आदेश जारी होने के बाद वो शब्द संसद के लिखित और डिजिटल इतिहास से हमेशा के लिए मिटा दिए जाते हैं. इसके बाद किसी भी मीडिया हाउस या फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए उन हटाए गए बयानों का प्रसारण या फिर रिपोर्टिंग करना कानूनी रूप से प्रतिबंधित हो जाता है.

यह भी पढ़ें: पुलिस को कौन देता है गोली चलाने का आदेश? यहां जान लीजिए जवाब

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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