Jodhpur Diwali Tradition: दिवाली पर शोक क्यों मनाते हैं जोधपुर के मौदगिल ब्राह्मण, क्या है वजह?
देशभर में जब लोग दिवाली पर दीये जलाकर खुशियां मनाते हैं, तब जोधपुर के कुछ मौदगिल और श्रीमाली ब्राह्मण परिवार शोक मनाते हैं. आइये जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह

दिवाली का त्योहार आते ही देशभर में घरों को दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है. लोग मिठाइयां बांटते हैं और खुशियां मनाते हैं. लेकिन राजस्थान के जोधपुर में कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जो इस दिन जश्न मनाने के बजाय शोक मनाते हैं. ये परिवार मौदगिल और श्रीमाली ब्राह्मण समुदाय से जुड़े हैं. इनकी इस परंपरा के पीछे लंकापति रावण से जुड़ा एक खास रिश्ता बताया जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ये लोग रावण को अपना दामाद और पूर्वज मानते हैं.
रावण का ससुराल माना जाता है जोधपुर का मंडोर
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, जोधपुर के पास स्थित मंडोर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है. कहा जाता है कि मंदोदरी का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ था और रावण से उनका विवाह भी यहीं हुआ था. इसी रिश्ते के चलते रावण को यहां का दामाद यानी जमाई राजा माना जाता है. इस वजह से क्षेत्र के कुछ परिवारों के लिए रावण की मृत्यु केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि परिवार से जुड़े व्यक्ति के निधन जैसी मानी जाती है.
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रावण से अपना संबंध क्यों मानते हैं ये ब्राह्मण?
मौदगिल और श्रीमाली ब्राह्मण समुदाय के कुछ परिवारों का मानना है कि उनके पूर्वजों ने रावण और मंदोदरी के विवाह की रस्में संपन्न कराई थीं. कुछ मान्यताओं के अनुसार, विवाह के बाद रावण के साथ आए ब्राह्मण और उनके परिवार मंडोर में ही बस गए थे. इसी वजह से इस समुदाय के कुछ लोग खुद को रावण के वंश और परिवार से जुड़ा मानते हैं. वे रावण को केवल रामायण का खलनायक नहीं, बल्कि विद्वान और भगवान शिव का बड़ा भक्त भी मानते हैं. जोधपुर में रावण का एक मंदिर भी है, जहां उनकी पूजा की जाती है.
दशहरे और दिवाली पर कैसे मनाते हैं शोक?
जब देश के दूसरे हिस्सों में दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है, तब इस समुदाय के कुछ परिवार इस आयोजन से दूरी बनाए रखते हैं. स्थानीय परंपरा के अनुसार, रावण दहन के बाद ये लोग स्नान करते हैं और शोक के प्रतीक के रूप में अपना जनेऊ बदलते हैं. इसके बाद ही भोजन करते हैं. दिवाली पर भी कुछ परिवार उत्सव मनाने के बजाय शोक की परंपरा निभाते हैं. इतना ही नहीं, पितृपक्ष के दौरान रावण, उनके पिता विश्रवा और दादा महर्षि पुलस्त्य के नाम से तर्पण और पिंडदान करने की मान्यता भी करते है.
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