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कभी थे दोस्त फिर ईरान का जानी दुश्मन कैसे बन गया अमेरिका? जान लें पूरा इतिहास

अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों देशों में कभी अच्छे रिश्ते थे. हालांकि, समय के साथ इनके रिश्तों में दरार आ गई. इजरायल और अमेरिका दोनों ही देश ईरान के दुश्मन बन गए.

अमेरिका ने ईरान और इजरायल के बीच जारी जंग में 22 जून को ईरान के तीन न्यूक्लियर साइट्स नितांज, इस्फ्हान और फोर्डो पर B-2 बॉम्बर से हमले किए थे. इसके जवाब में ईरान ने कतर की राजधानी दोहा में स्थित अमेरिकी बेस को मिसाइलों से निशाना बनाया था. हालांकि, ईरानी मिसाइलों से अमेरिका के बेस को कुछ ज्यादा नुकसान नहीं हुआ. लेकिन फिर से दोनों देशों के बीच दुश्मनी खुलकर सामने आ गई, जो कई साल से चली आ रही है.

हालांकि, ऐसे हालात हमेशा से नहीं था. एक दौर था, जब ईरान, इजरायल और अमेरिका तीनों के रिश्ते काफी अच्छे थे. ईरान उन देशों में शामिल था, जिसने इजरायल को सबसे पहले मान्यता दी थी. ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि एक समय के अच्छे दोस्त रहे ईरान, अमेरिकी और इजरायल के रिश्तों में इतनी दरार आ गई? 

ईरान कैसे बना अमेरिका का दुश्मन?

शिया बाहुल्य देश ईरान अपने तेल और गैस भंडार के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि 19वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी और ईरान की दोस्ती काफी गहरी थी. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब ब्रिटेन और सोवियत संघ ने मिलकर ईरान पर हमला बोला तो ब्रिटेन और अमेरिका की दोस्ती को जानते हुए भी ईरान ने अमेरिका के साथ अपने रिश्ते को बरकरार रखा. रिश्ते में दरार का दौर तब शुरू हुआ, जब ईरान में तेल मिला. उस समय ब्रिटेन ने अपनी तेल कंपनियों की मदद से ईरान में मौजूद तेल की खदानों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया. ईरान के लोग इससे काफी नाखुश थे, लेकिन उस समय पहलवी वंश के शासन के चलते वे कुछ कर नहीं कर सकते थे. धीरे-धीरे ईरान की जनता ने देश में राजाशाही को खत्म करने और लोकतंत्र लाने का प्रयास किया. हुआ भी कुछ ऐसा.  ईरान में 1952 में चुनाव हुए और मोहम्मद मोसादेग प्रधानमंत्री चुने गए. 

अमेरिका ने हटा दिया था ईरान का प्रधानमंत्री 

ईरान में लोकतंत्र की स्थापना ब्रिटेन के लिए किसी गहरे सदमे से कम नहीं था, क्योंकि ईरान में उसके हाथ से तेल की खदान निकलने वाली थीं. अमेरिका और ब्रिटेन ईरान में  लोकतंत्र तो चाहते थे, लेकिन वे किसी कठपुतली को सत्ता पर बैठाना चाहते थे. वहीं, मोहम्मद मोसादेग जीत के बाद तेल का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे, लेकिन तेल की कंपनियां ब्रिटेन की थीं और इसी बात को लेकर दोनों देशों के बीच रिश्ते बिगड़ने लगे. ब्रिटेन किसी भी तरह ईरान के तेल को नहीं छोड़ना चाहता था. उसने 1953 में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के साथ मिलकर वहां तख्तापलट करके प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को हटाकर शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी. 

अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुई दुश्मनी

तख्तापलट के बाद ईरान के लोगों के अंदर अमेरिका को लेकर खुन्नस बढ़ने लगी और लोग उसके कट्टर विरोधी बन गए. तेल पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए 70 के दशक में दोनों देशों के बीच परमाणु समझौता हुआ. इसमें अमेरिका की तरफ से ईरान को तकनीक और रिसर्च दोनों मुहैया कराई जा रही थी. हालांकि, बाद में अमेरिका के चलते ही इस कार्यक्रम पर विवाद हो गया. ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद दोनों देशों के रिश्ते में काफी बदलाव हुए. इसी क्रांति के बाद ईरान ने अमेरिका से राजनयिक संपर्क खत्म कर लिया. इसके बाद से ही दोनों देशों में दुश्मनी का दौर शुरू हो गया और अमेरिका ने ईरान पर तमाम प्रतिबंध लगा दिए. 

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