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साधारण vs विशेष बहुमत, जान लीजिए संसद में बिल पास कराने का वह नियम, जो कोई नहीं समझाता

संसद में जब भी कोई बिल पास कराना होता है या फिर संविधान में कोई खास बदलाव करना होता है, तो इसके लिए दो तरह से बहुमत पास कराया जाता है. एक होता है साधारण बहुमत एक है विशेष बहुमत. चलिए इनके बारे में जानें.

जब भी देश की संसद में नया कानून बनता है या फिर पुराना बदला जाता है तो एक शब्द बार-बार गूंजता है और वह है बहुमत. लेकिन क्या आपको पता है कि हर बिल पास कराने के लिए एक ही तराजू का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है? संसद के अंदर बिल पास कराने का ऐसा गणित है, जो कि उसकी गंभीरता के हिसाब से बदला जाता है. इसे साधारण और विशेष बहुमत कहा जाता है. यह नियम जितना पेचीदा दिखता है, असल में उससे भी ज्यादा दिलचस्प है और यही तय करता है कि देश की सरकार कितनी ताकत के साथ कोई फैसला ले सकती है.

साधारण बहुमत क्या है?

संसद के कामकाज को चलाने के लिए सबसे ज्यादा साधारण बहुमत का इस्तेमाल किया जाता है. इसका सीधा सा नियम है- जिस दिन सदन में किसी बिल पर वोटिंग हो रही है, उस वक्त वहां पर जितने सांसद मौजूद हैं और वोट डाल रहे हैं, उनके आधे से अधिक (50%+1) का समर्थन मिलना जरूरी है. मान लीजिए किसी दिन लोकसभा में 400 सांसद मौजूद हैं, तो बिल पास कराने के लिए सिर्फ 201 वोटों की जरूरत होगी. देश के बजट, पैसों से जुड़े धन विधेयक, नए राज्यों को बनाने या फिर सरकार बचाने और गिराने वाले अविश्वास प्रस्तावों के लिए इसी फॉर्मूले का इस्तेमाल होता है.

विशेष बहुमत क्या होता है?

जब बात देश के बुनियादी नियमों यानी संविधान में बदलाव की आती है, तो सरकार अपनी मर्जी से सब कुछ नहीं बदल सकती है. इसके लिए विशेष बहुमत जरूरी होता है. इसके तहत पहला नियम अनुच्छेद 368 में है, जिसमें दो शर्तें एकसाथ पूरी होनी चाहिए. पहली शर्त यह है कि बिल को सदन की कुल सीटों के आधे से ज्यादा सांसदों का समर्थन मिले और दूसरी शर्त यह है कि वोटिंग के दिन मौजूद सांसदों में से कम से कम दो तिहाई लोग उसके पक्ष में हों. यह नियम सामान्य तौर पर संविधान संशोधन के लिए लागू होता है.

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राज्यों के हक का कानून

संविधान में कुछ बदलाव ऐसे होते हैं, जो कि सीधे तौर पर राज्यों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, जैसे राष्ट्रपति का चुनाव या सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां. ऐसे मामलों में नियम और भी कड़ा हो जाता है. यहां संसद के दोनों सदनों से दो तिहाई बहुमत से बिल पास कराने के बाद, उसे देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं में भी पास कराना पड़ता है. इसके अलावा अनुच्छेद 249 के तहत अगर केंद्र सरकार को राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाना हो, तब भी उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है.

महाभियोग के नियम पर बिल सांसदों का समर्थन

संसद के नियमों में यह सबसे मजबूत और कठिन बहुमत है. इसका इस्तेमाल देश के राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने यानी उनको पद से हटाने के लिए किया जाता है. अनुच्छेद 61 के तहत बनने वाले इस नियम में उपस्थित सदस्यों की संख्या मायने नहीं रखती है. इसमें सदन की जो कुल सदस्य संख्या है, उसके दो-तिहाई सांसदों का समर्थन बिल के पक्ष में होना अनिवार्य है. यह नियम इतना सख्त इसलिए बनाया जाता है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के साथ कोई राजनीतिक खिलवाड़ न हो सके.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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