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जब नहीं थी मशीनें तब कैसे होती थी बीमारी की जांच, कौन सा तरीका अपनाते थे हमारे पूर्वज?

ये वैद्य शरीर और बीमारियों की समझ के लिए आयुर्वेदिक ज्ञान और अनुभव पर भरोसा करते थे. वैद्य लोग अपने मरीजों का निरीक्षण करने के कई तरीके अपनाते थे.

आज हम किसी बीमारी का पता लगाने के लिए एक्स-रे, ब्लड टेस्ट, एमआरआई और कई आधुनिक मशीनों का यूज करते हैं. डॉक्टर हमसे हमारी आदतें पूछते हैं, जांच करते हैं और फिर दवाइयां लिखते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लगभग 500 साल पहले, जब ऐसी कोई मशीनें नहीं थी और आधुनिक दवाइयां भी नहीं थीं, लोग बीमारियों का इलाज कैसे करते थे. उस समय डॉक्टर नहीं बल्कि वैद्य होते थे. ये वैद्य शरीर और बीमारियों की समझ के लिए आयुर्वेदिक ज्ञान और अनुभव पर भरोसा करते थे. वैद्य लोग अपने मरीजों का निरीक्षण करने के कई तरीके अपनाते थे. तो आइए जानते हैं कि जब नहीं थी मशीनें तब बीमारी की जांच कैसे होती थी, हमारे पूर्वज कौन सा तरीका अपनाते थे . 
 
जब नहीं थीं मशीनें, तब बीमारी की जांच कैसे होती थी?

जब मशीनें और आधुनिक टेस्ट मौजूद नहीं थे, तब बीमारी का पता लगाने का तरीका पूरी तरह मानव शरीर और अनुभव पर आधारित था. हमारे पूर्वज यानी वैद्य और हर्बल चिकित्सक इसे बहुत महीन तरीके से करते थे. इन तरीकों में नाड़ी (पल्स) देखना, आंख और जीभ देखना, शरीर की बनावट और रंग देखना प्रमुख थे. खासतौर से नाड़ी जांच बहुत ही लोकप्रिय और असरदार मानी जाती थी. वैद्य मानते थे कि नाड़ी हमारे शरीर की स्थिति और बीमारियों का संकेत देती है.

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हमारे पूर्वज कौन सा तरीका अपनाते थे?

1. नाड़ी (पल्स) देखकर - वैद्य कहते थे कि हर बीमारी का असर हार्ट की धड़कन पर पड़ता है.  नाड़ी पकड़कर वे देख सकते थे कि यह तेज है, धीमी है या असमान चल रही है. नाड़ी की ताकत, लय और गति से वे यह समझ लेते थे कि शरीर में कौन सी समस्या है. पुरुषों की नाड़ी आमतौर पर दाएं हाथ से और महिलाओं की बाएंं हाथ से जांची जाती थी. सही नाड़ी जांच के लिए सुबह खाली पेट दिखाना जरूरी माना जाता था. 

2. आंख और जीभ देखकर - आंखों का रंग, चमक और स्थिति देखकर शरीर में किसी प्रकार की कमजोरी या रोग का पता लगाया जाता था. जीभ का रंग, बनावट और आकर देखकर भी रोग का अंदाजा लगाया जाता था. यह तरीका नाड़ी जितना सटीक नहीं था, लेकिन बहुत वैद्य इसे एक सहायक जांच के रूप में प्रयोग करते थे. 

3. शरीर और बाहरी लक्षण देखकर - शरीर की स्किन, बाल, नाखून, और हड्डियों की स्थिति देखकर रोग का अंदाजा लगाया जाता था. जड़ी-बूटियों, जानवरों से बनी दवाओं और अनुभव के आधार पर इलाज किया जाता था. 

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मानसी उपाध्याय करीब दो साल से डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ी मानसी ने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी की. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की और वर्तमान में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म कर रही हैं. पत्रकारिता में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अक्टूबर 2024 में एबीपी नेटवर्क से की. अब वह डिजिटल कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें फीचर और इंफॉर्मेटिव स्टोरीज लिखने के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटिंग, सोशल मीडिया और रिसर्च आधारित कंटेंट तैयार करने में रुचि है. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली मानसी ऐसी स्टोरीज लिखना पसंद करती हैं, जो पाठकों को नई और जरूरी जानकारी आसान भाषा में दें. उनकी कोशिश रहती है कि कंटेंट सिर्फ जानकारी देने वाला ही नहीं, बल्कि पढ़ने में दिलचस्प और पाठकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ भी हो.

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