जब अल्ट्रासाउंड मशीने नहीं थीं, तब कैसे होती थी प्रेग्नेंसी की जांच?
अल्ट्रासाउंड मशीनों के आने से पहले प्रेग्नेंसी की जांच शारीरिक बदलावों और अन्य कई पुराने अनुभवों और जानकारी के आधार पर की जाती थी. 1920 के दशक में यूरिन टेस्ट के लिए जानवरों की मदद ली जाती थी.

- जानवरों पर यूरिन टेस्ट और हेगार साइन से भी होता था पता.
आज के समय में प्रेग्नेंसी का पता लगाना बेहद आसान हो चुका है. मेडिकल स्टोर से मिलने वाली एक छोटी सी स्ट्रिप या फिर डॉक्टर के क्लिनिक में होने वाला एक साधारण अल्ट्रासाउंड टेस्ट कुछ ही मिनटों में सब कुछ साफ कर देता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया में यह आधुनिक तकनीकें और अल्ट्रासाउंड मशीनें नहीं थीं, तब डॉक्टर या दाइयां कैसे बताती थीं कि कोई महिला गर्भवती है या नहीं? उस दौर में विज्ञान आज जितना एडवांस नहीं था, फिर भी सदियों से लोग बेहद सटीक तरीके से प्रेग्नेंसी का पता लगा लेते थे. आइए जानते हैं चिकित्सा विज्ञान के उस दौर की दिलचस्प कहानी.
शरीर के शुरुआती इशारे और लक्षण से कैसे लगता था पता?
पुराने समय में जब कोई मशीन मौजूद नहीं थी, तब प्रेग्नेंसी का पता लगाने का सबसे पहला और मुख्य जरिया महिला के शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलाव ही होते थे. मासिक धर्म यानी पीरियड्स (periods) का रुक जाना गर्भावस्था का सबसे पहला और पुख्ता संकेत माना जाता था. इसके अलावा, रिपोर्ट्स बताती हैं कि महिलाओं को सुबह के वक्त होने वाली कमजोरी और उल्टी की शिकायत, जिसे मॉर्निंग सिकनेस कहते हैं, स्तनों में आने वाली सूजन और बार-बार यूरिन आने जैसे आम लक्षणों को देखकर अनुभवी लोग प्रेग्नेंसी का सटीक अंदाजा लगा लेते थे.
पेल्विक जांच से गर्भाशय की परख
शारीरिक लक्षणों के बाद बारी आती थी अंदरूनी जांच की, जिसे पेल्विक एग्जामिनेशन कहा जाता है. उस दौर में अनुभवी डॉक्टर्स या गांवों में रहने वाली दाइयां महिला के योनि और गर्भाशय की बारीकी से जांच करती थीं. गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में महिला के गर्भाशय के आकार में तेजी से बदलाव आने लगता है. इतना ही नहीं, अंदरूनी हिस्सों का रंग बदलकर गहरा नीला या बैंगनी होने लगता था. इन शारीरिक और रंगत के बदलावों को देखकर डॉक्टर्स बिना किसी मशीन के यह आसानी से सुनिश्चित कर लेते थे कि महिला गर्भधारण कर चुकी है.
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फेटोस्कोप से धड़कन सुनने की कला
जैसे-जैसे गर्भ में दिन बीतते थे, जांच के तरीके भी थोड़े बदल जाते थे. जब गर्भावस्था अपने मध्य महीनों यानी दूसरी तिमाही में पहुंचती थी, तब डॉक्टर बच्चे की सेहत और उसकी मौजूदगी जानने के लिए एक खास तरह के स्टेथोस्कोप का इस्तेमाल करते थे. इस विशेष उपकरण को फेटोस्कोप कहा जाता था. डॉक्टर इस फेटोस्कोप को गर्भवती महिला के पेट पर लगाकर बहुत ही ध्यान से भ्रूण के दिल की धड़कन को सुनने की कोशिश करते थे. इस धड़कन को सुनना इस बात का सबसे बड़ा सबूत होता था कि गर्भ में बच्चा सुरक्षित रूप से पल रहा है.
जानवरों पर यूरिन टेस्ट का प्रयोग
चिकित्सा के इतिहास में 1920 का दशक बेहद अजीब और हैरान करने वाले प्रयोगों का गवाह रहा है. इसी दौर में पहली बार हार्मोन आधारित यूरिन टेस्ट की शुरुआत हुई थी. उस समय आज की तरह रेडीमेड किट नहीं होती थीं, इसलिए महिला के यूरिन को मेंढक, खरगोश या चूहों जैसे छोटे जानवरों के शरीर में इंजेक्ट किया जाता था. अगर महिला गर्भवती होती थी, तो उसके यूरिन में मौजूद खास हार्मोन्स की वजह से उन जानवरों के शरीर और अंगों में बहुत तेजी से बदलाव दिखने लगते थे. इस प्रक्रिया से प्रेग्नेंसी की पुष्टि की जाती थी.
हेगार साइन और गर्भाशय का लचीलापन
पुराने दौर के डॉक्टर्स महिला के पेट और गर्भाशय को छूकर भी बहुत कुछ पता लगा लेते थे. इस खास क्लीनिकल जांच को चिकित्सा की भाषा में हेगार साइन कहा जाता था. इसके तहत डॉक्टर्स महिला के गर्भाशय के सबसे निचले हिस्से, जिसे इस्थमस कहते हैं, को अपनी उंगलियों से छूकर महसूस करते थे. प्रेग्नेंसी के शुरुआती हफ्तों में गर्भाशय का यह हिस्सा सामान्य दिनों के मुकाबले बेहद मुलायम और लचीला हो जाता था. इस छूने के अनुभव से डॉक्टर बिना किसी संशय के नतीजे पर पहुंच जाते थे.
आधुनिक विज्ञान और आज की तकनीक
समय बदला और चिकित्सा विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली कि अब पुराने और जटिल तरीकों की जरूरत ही नहीं बची. आज के आधुनिक युग में अस्पताल पूरी तरह से एडवांस तकनीक का समर्थन करते हैं. अब बेहद सटीक और तुरंत परिणाम देने वाले एचसीजी यूरिन टेस्ट (HCG Urine Tests) और हाई-टेक अल्ट्रासाउंड का जमाना है. इनकी मदद से कोई भी महिला घर बैठे या फिर किसी भी लैब में जाकर महज कुछ ही मिनटों के भीतर अपनी प्रेग्नेंसी की बिल्कुल सही और सुरक्षित जानकारी हासिल कर सकती है.
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