एक्सप्लोरर

शिया मुस्लिमों पर पाबंदियां क्यों लगा रही अफगानिस्तान की तालिबान सरकार, किस बैन से क्या असर?

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार शिया समुदाय पर लगातार धार्मिक, कानूनी और सामाजिक पाबंदियां बढ़ा रही है. सुन्नी हनफी परंपरा थोपने से शिया पर्सनल लॉ और पारंपरिक आयोजनों पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है.

Show Quick Read
Key points generated by AI, verified by newsroom
  • तालिबान शिया अल्पसंख्यकों पर रूढ़िवादी हनफी विचारधारा थोप रहा है.
  • शिया पर्सनल लॉ खत्म, धार्मिक व कानूनी अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए.
  • मुहर्रम, आशूरा जैसे आयोजनों और नमाज के तरीकों पर कड़े नियम.
  • नौकरियों से हटाकर, बेदखल कर शिया समुदाय का आर्थिक बहिष्कार हो रहा.

अफगानिस्तान की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के बाद से तालिबान ने देश में अपनी कट्टरपंथी विचारधारा को पूरी तरह लागू करना शुरू कर दिया है. इसके तहत वहां रहने वाले अल्पसंख्यक शिया मुसलमानों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है. तालिबान प्रशासन अपनी रूढ़िवादी सुन्नी हनफी व्याख्या को जबरन पूरे देश पर थोप रहा है, जिससे शिया समुदाय की धार्मिक आजादी और उनके बुनियादी अधिकार खतरे में पड़ गए हैं. मस्जिदों में नमाज पढ़ने के तरीकों से लेकर शादी-ब्याह के शिया पर्सनल लॉ तक पर सरकार ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं. यह पाबंदियां न सिर्फ शिया नागरिकों को उनके ही देश में बेगाना बना रही हैं, बल्कि उनकी सामाजिक और आर्थिक रीढ़ को भी तोड़ रही हैं.

शिया समुदाय का भौगोलिक ताना-बाना

अफगानिस्तान की कुल आबादी में शिया मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 10 से 15 प्रतिशत के बीच है. इस समुदाय के लोग मुख्य रूप से हजारा और इस्माइली नस्ल से ताल्लुक रखते हैं. यह लोग अफगानिस्तान की राजनीति और संस्कृति का एक बेहद अहम हिस्सा रहे हैं. लेकिन तालिबान के आते ही इस पूरी आबादी को हाशिए पर धकेलने का काम शुरू कर दिया गया है. देश के विभिन्न इलाकों में रहने वाले इन लोगों को न सिर्फ अपनी पहचान छिन जाने का डर सता रहा है, बल्कि वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी एक बड़े संकट का सामना कर रहे हैं. 

कानून की मान्यता पर बड़ा प्रहार

तालिबान ने सत्ता में आते ही जो सबसे पहला और बड़ा प्रहार किया, वह था शिया समुदाय के जाफरी न्यायशास्त्र की आधिकारिक मान्यता को पूरी तरह से खत्म कर देना. अब अफगानिस्तान की सभी अदालतों और कानूनी मामलों में सिर्फ और सिर्फ सुन्नी हनफी परंपरा के तहत ही फैसले लिए जा रहे हैं. इस एक फैसले ने शिया पर्सनल लॉ को पूरी तरह पंगु बना दिया है. इसके चलते पारिवारिक विवादों, जमीन-जायदाद के मामलों और विरासत के फैसलों में शिया नागरिकों को किसी भी तरह की कानूनी राहत मिलनी पूरी तरह से बंद हो गई है. 

यह भी पढ़ें: नेपाल के साथ कितना बॉर्डर शेयर करता है भारत, इसमें कहां-कहां है विवाद?

निकाह के नियमों और मौलवियों पर सख्ती

हाल ही में काबुल से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संगठनों का ध्यान खींचा. वहां के एक वरिष्ठ शिया आलिम को तालिबान अधिकारियों ने सिर्फ इसलिए तलब किया क्योंकि उन्होंने शिया जाफरी फिक्ह के अनुसार एक अस्थायी निकाह (निकाह-ए-मुतआ) का अनुबंध कराया था. तालिबान ने इस परंपरा को पूरी तरह प्रतिबंधित घोषित कर रखा है, क्योंकि यह सुन्नी हनफी फिक्ह में मान्य नहीं है. इस मामले में शिया मौलवी के साथ न सिर्फ हिंसा की गई, बल्कि उन्हें भविष्य में ऐसा न करने की सख्त चेतावनी भी दी गई.

मुहर्रम और आशूरा पर कड़े प्रतिबंध

अफगानिस्तान में विपक्षी समूहों और आम शिया नागरिकों का आरोप है कि तालिबान सरकार वक्त-ब-वक्त मुहर्रम और आशूरा के सार्वजनिक आयोजनों को बेहद सीमित करती जा रही है. आशूरा के दिन शिया मुसलमान पैगंबर इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन की शहादत का मातम मनाते हैं. अब इन आयोजनों के दौरान न तो बड़े जुलूस निकालने की इजाजत है और न ही लाउडस्पीकर पर शोक सभाएं करने की छूट दी जा रही है. तालिबान प्रशासन इन कड़े प्रतिबंधों को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए उठाए गए 'सख्त एहतियाती कदम' बताकर अपना पल्ला झाड़ लेता है.

नमाज के तरीकों को बदलने की चेतावनी

धार्मिक आजादी को दबाने का एक और बड़ा उदाहरण गजनी प्रांत के दक्षिण-पूर्वी इलाके में देखने को मिला है. वहां तालिबान के अख्लाकी मंत्रालय (सदाचार मंत्रालय) के अधिकारियों ने शिया नमाजियों को साफ तौर पर चेतावनी दी है कि वे अपनी पारंपरिक पद्धति को छोड़कर सुन्नी हनफी फिक्ह के मुताबिक नमाज पढ़ें. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उनकी मस्जिदों को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा और नमाजियों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा. इस तरह के फरमानों से शिया नागरिकों में भारी आक्रोश और डर का माहौल है.

नमाजों के समय पर जबरन दखलंदाजी

गजनी शहर के नजदीकी इलाके नवााबाद में तालिबान अधिकारियों ने स्थानीय शिया आबादी को एक नया फरमान सुनाया है. इसके तहत उन्हें मगरिब (शाम) और ईशा (रात) की नमाजें अलग-अलग समय पर अदा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. जबकि शिया जाफरी फिक्ह के मुताबिक, इन दोनों नमाजों को एक साथ मिलाकर पढ़ना एक बेहद सामान्य और स्थापित परंपरा मानी जाती है. इसके अलावा, शिया मस्जिदों को यह निर्देश भी दिया गया है कि वे अपनी अजान का समय सुन्नी मस्जिदों के समय के साथ मिलाएं या फिर अजान का सार्वजनिक प्रसारण पूरी तरह रोक दें.

त्योहारों की तारीखों पर भी पाबंदी

जब भी कभी चांद दिखने या इस्लामी त्योहारों जैसे कि ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा के निर्धारण में दोनों संप्रदायों के बीच मामूली मतभेद होता है, तब भी तालिबान अपनी ताकत का दुरुपयोग करता है. तालिबान प्रशासन शिया नागरिकों को जबरदस्ती अपनी फिक्ह के मुताबिक तय की गई तारीखों पर ही ईद मनाने के लिए मजबूर करता है. शिया नागरिकों को अपनी धार्मिक गणना के अनुसार त्योहार मनाने की कोई आजादी नहीं है, और ऐसा न करने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जाती हैं.

जबरन धर्मांतरण का गहराता संकट

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार, अफगानिस्तान के सुदूर बदख्शां जैसे प्रांतों में हालात और भी ज्यादा बदतर हो चुके हैं. वहां रहने वाले इस्माइली शिया समुदाय के लोगों को जबरन सुन्नी संप्रदाय में परिवर्तित कराने के कई डरावने मामले सामने आए हैं. जो लोग इस जबरन धर्मांतरण का विरोध करने की हिम्मत जुटाते हैं, उन्हें जान से मारने या देश छोड़ने की सीधे तौर पर धमकियां दी जा रही हैं. इसके साथ ही, स्थानीय शिया मौलवियों को डरा-धमकाकर उनसे जबरन लिखित मुचलके भरवाए जा रहे हैं.

सुरक्षा का अभाव और आईएस के हमले

तालिबान की इन सरकारी पाबंदियों के बीच शिया समुदाय के सामने सबसे बड़ा संकट अपनी जान बचाने का है. 'इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासान प्रोविंस' (ISKP) यानी दाएश जैसे खूंखार चरमपंथी संगठन लगातार शिया बहुल इलाकों को अपना निशाना बना रहे हैं. पश्चिमी काबुल के दश्त-ए-बारची और हेरात जैसे क्षेत्रों में शिया मस्जिदों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर लगातार आत्मघाती और हिंसक हमले हो रहे हैं. इन हमलों में बड़े पैमाने पर बेगुनाह नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है और तालिबान उन्हें सुरक्षा देने में पूरी तरह नाकाम रहा है.

आर्थिक और सामाजिक रूप से बहिष्कार

इन सब पाबंदियों का एक बहुत ही सोचा-समझा आर्थिक असर भी शिया समुदाय पर डाला जा रहा है. शिया हजारा समुदाय के लोगों को सरकारी नौकरियों और प्रशासनिक पदों से सुनियोजित तरीके से चुन-चुनकर हटाया जा रहा है. इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में दशकों पुराने भूमि विवादों का एकतरफा फैसला सुनाते हुए शिया परिवारों को उनके अपने घरों और उपजाऊ कृषि क्षेत्रों से जबरन बेदखल किया जा रहा है. इस व्यवस्था के कारण हजारों शिया परिवार दाने-दाने को मोहताज होकर अपने ही देश में विस्थापित जीवन जीने को मजबूर हो गए हैं.

यह भी पढ़ें: Unconquered Forts: भारत के इन किलों पर अब तक नहीं कर पाया कोई कब्जा, जान लीजिए इतिहास

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

Read More
और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola
Advertisement

टॉप हेडलाइंस

झारखंड में उठी CBI जांच की मांग, जानें क्या हैं CBI जांच के नियम और कैसे होती है यह?
झारखंड में उठी CBI जांच की मांग, जानें क्या हैं CBI जांच के नियम और कैसे होती है यह?
कितने बच्चों तक मिलती है मैटरनिटी लीव, क्या तीसरे बच्चे पर बदल जाता है नियम?
कितने बच्चों तक मिलती है मैटरनिटी लीव, क्या तीसरे बच्चे पर बदल जाता है नियम?
McMahon Line से Map War तक, भारत-चीन सीमा विवाद के 10 बड़े सवाल और जवाब
McMahon Line से Map War तक, भारत-चीन सीमा विवाद के 10 बड़े सवाल और जवाब
हर सेकंड कितना पानी फेंकती है वॉटर कैनन, जानें ये कितने खतरनाक
हर सेकंड कितना पानी फेंकती है वॉटर कैनन, जानें ये कितने खतरनाक
Advertisement

वीडियोज

The Traitors 2 का नया Sneak Peek Out, Rhea Chakraborty से Mallika Sherawat तक दिखा बड़ा Drama
Lock Upp 2 की Success Party में Shreya Kalra का जलवा, Farhana Bhatt समेत सितारों ने बिखेरा Glamour
Salman Khan की Seven Dogs 21 August को India में रिलीज, Sanjay Dutt का होगा खास Cameo
Amruta Khanvilkar ने Divorce Rumours पर जताई नाराजगी, Legal Action की दी चेतावनी
Govinda ने मां Nirmala Devi को खोने का दर्द किया बयां, बोले- लगा सब कुछ खत्म हो गया
Advertisement

फोटो गैलरी

Advertisement

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
'तृषा को डिप्टी CM...', AIADMK विधायक ने CM विजय पर कसा तंज
'तृषा को डिप्टी CM...', AIADMK विधायक ने CM विजय पर कसा तंज
अब भोपाल में Gen Z का आंदोलन! इस मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे छात्र
अब भोपाल में Gen Z का आंदोलन! इस मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे छात्र
पुर्तगाल क्रिकेट टीम का हुआ एलान, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बना कप्तान
पुर्तगाल क्रिकेट टीम का हुआ एलान, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बना कप्तान
गोवा में पेंट हाउस, मुंबई में करोड़ों का बंगला, 100 करोड़ से ज्यादा का है इमरान हाशमी का साम्राज्य, नेटवर्थ जान उड़ जाएंगे होश
100 करोड़ से ज्यादा का है इमरान हाशमी का साम्राज्य, नेटवर्थ जान उड़ जाएंगे होश
JPC भेजा जाएगा FCRA बिल, विरोध के बीच सरकार का बड़ा कदम
JPC भेजा जाएगा FCRA बिल, विरोध के बीच सरकार का बड़ा कदम
Gen-Z का क्या है चुनावी मुद्दा? आंदोलनों के बीच सर्वे के जवाब ने चौंकाया
Gen-Z का क्या है चुनावी मुद्दा? आंदोलनों के बीच सर्वे के जवाब ने चौंकाया
आरोप से बेदाग बरी होने तक: कैसे अडानी शेयर्स और मार्केट कैप ने की वापसी?
आरोप से बेदाग बरी होने तक: कैसे अडानी शेयर्स और मार्केट कैप ने की वापसी?
वंदे मातरम बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी, शशि थरूर बोले- राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत...
वंदे मातरम बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी, शशि थरूर बोले- राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत...
Embed widget