खुद की एयरलाइन शुरू करने के लिए कितना पैसा चाहिए, क्या है प्रोसीजर?
भारत में नई एयरलाइन शुरू करने के लिए कम से कम 100 से 150 करोड़ के शुरुआती निवेश और मंत्रालय से NOC व DGCA से एयर ऑपरेटर परमिट की सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश की पहली घरेलू एयरलाइन, शंख एयर के डायरेक्टर्स के ठिकानों पर आईटी विभाग ने कार्रवाई शुरू की है. इसके बाद से ही शंख एयरलाइन का नाम चर्चा में आ गया है. बता दें, हाल ही में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने शंख एयर को हरी झंडी दी थी. ऑटो ड्राइवर से लेकर एयरलाइन खोलने वाले श्रवण कुमार विश्वकर्मा की कहानी वाकई दिलचस्प है. हालांकि, आयकर विभाग की कार्रवाई ने कई सवाल भी खड़े किए हैं.
ऐसे में हर किसी के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत में अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करने के लिए कितने रुपयों की जरूरत होती है और इसके लिए सरकार से कौन-कौन सी मंजूरियां लेनी पड़ती हैं.
एयरलाइन शुरू करने के लिए कितना पैसा चाहिए?
एविएशन बिजनेस में कदम रखना बहुत भारी निवेश की मांग करता है क्योंकि इसमें हर स्तर पर बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है. अगर कोई व्यक्ति भारत में एक बड़े स्तर की राष्ट्रीय एयरलाइन शुरू करना चाहता है, तो उसे कम से कम 500 करोड़ से 1500 करोड़ के शुरुआती निवेश की जरूरत पड़ती है. हालांकि, सरकार की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं के तहत अगर कोई केवल चुनिंदा क्षेत्रीय रूट्स के लिए छोटे विमानों के साथ रीजनल कम्यूटर एयरलाइन शुरू करना चाहता है, तो यह काम थोड़े कम बजट के साथ भी मुमकिन हो सकता है.
इस बिजनेस में सबसे बड़ा निवेश विमानों को खरीदने या उन्हें अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से किराए पर लेने में होता है. इसके अलावा अनुभवी पायलटों और क्रू मेंबर्स की भारी-भरकम सैलरी, विमानों का नियमित रखरखाव और मेंटेनेंस, रोजाना का हवाई ईंधन, एयरपोर्ट्स पर पार्किंग स्लॉट हासिल करने की फीस और सिक्योरिटी डिपॉजिट जैसी चीजों में शुरुआती दौर में ही करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं.
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क्या है एयरलाइन शुरू करने का सरकारी प्रोसीजर?
भारत में आसमान में विमान उड़ाने से पहले जमीन पर कागजी और कानूनी प्रक्रियाओं की एक बहुत लंबी और जटिल श्रृंखला को पार करना पड़ता है, जिसमें आमतौर पर 18 महीने से लेकर 3 साल तक का समय लग जाता है. सबसे पहले कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के तहत अपनी कंपनी को एक एविएशन फर्म के रूप में रजिस्टर कराना होता है, जिसमें पूरा बिजनेस प्लान और रूट्स की रूपरेखा तय की जाती है.
कंपनी रजिस्टर होने के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय को एयरलाइन से जुड़ा पूरा ब्योरा सौंपना होता है, जहां मंत्रालय सुरक्षा और वित्तीय स्थिति की बारीकी से जांच करने के बाद कंपनी को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट NOC जारी करता है, जैसा हाल ही में शंख एयर को मिला है.
एनओसी मिलने के बाद सबसे महत्वपूर्ण कदम नागरिक उड्डयन महानिदेशालय से एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट हासिल करना होता है, जिसकी प्रक्रिया चार कड़े चरणों में चलती है और इसमें पायलटों की योग्यता जांच, विमानों का सेफ्टी ऑडिट और डेमो फ्लाइट्स शामिल होती हैं. इसके साथ ही, एयरलाइन की सुरक्षा व्यवस्था, स्टाफ के बैकग्राउंड और सुरक्षा नियमों के कड़े पालन को सुनिश्चित करने के लिए ब्यूरो ऑफ से अंतिम सुरक्षा मंजूरी लेनी अनिवार्य होती है, जिसके बाद ही कोई एयरलाइन उड़ान भर सकती है.
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