India Ethanol Production: गन्ने से कितना एथेनॉल बनाता है भारत, चीनी के लिए कितना बचता है?
India Ethanol Production: भारत में अब 100% एथेनॉल से चलने वाले वाहनों पर चर्चा चल रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि गन्ने से कितना एथेनॉल बनाया जाता है. जानें इस बारे में पूरी जानकारी.

- सुप्रीम कोर्ट ने इथेनॉल आपूर्ति योजना पर सरकार से पूछा।
- इथेनॉल गन्ना, अनाज से बनता, अनाज मुख्य स्रोत है।
- सरकार ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन पर लगाई रोक।
India Ethanol Production: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से पूछा कि अगर 100% एथेनॉल से चलने वाले वाहनों को मंजूरी दी जाती है तो सरकार एथेनॉल की आपूर्ति पूरी हो यह बात कैसे पक्की करेगी. कोर्ट ने कहा कि इस सवाल पर जनहित में विचार किया जाना चाहिए जिसमें पर्यावरण और किसानों के सशक्तिकरण पर भी ध्यान दिया जाए.
भारत में एथेनॉल की आपूर्ति गन्ने और अनाज दोनों से होती है. कुछ एथेनॉल उत्पादन का लगभग 30% हिस्सा गन्ने से आता है, जबकि बाकी 70% अनाज से मिलता है. इसमें मक्का, टूटा हुआ चावल और भारतीय खाद्य निगम के पास मौजूद अतिरिक्त चावल शामिल हैं.
गन्ने और अनाज का योगदान
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच देश में कुल 8.95 बिलियन लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई. इसमें से 2.71 बिलियन लीटर गन्ने से और 6.4 बिलियन लीटर अनाज से मिला.
कुल आपूर्ति में गन्ने का योगदान लगभग 30% है. इस वजह से एथेनॉल और चीनी के उत्पादन के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए गन्ने की उपलब्धता और उत्पादन के तरीके का चुनाव काफी ज्यादा जरूरी हो जाता है.

चीनी बनाने के लिए कितना गन्ना बचता है?
आंकड़ों से यह पता चलता है कि भारत के कुल गन्ने या फिर चीनी उत्पादन का सिर्फ 9% से 10% हिस्सा ही एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इस आधार पर लगभग 90% से 91% गन्ना चीनी उत्पादन के लिए मौजूद रहता है.
हाल के सीजन में एथेनॉल के लिए इस्तेमाल किया गया गन्ना लगभग 2.5 मिलियन से 2.8 मिलियन टन चीनी के बराबर था. हालांकि चीनी की मौजूदगी पर इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि चीनी बनाने की प्रक्रिया के किस चरण से गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए किया गया है .

एथेनॉल उत्पादन के तीन तरीके
गन्ने से एथेनॉल तीन तरीकों से बनाया जा सकता है. सीधे गन्ने के रस से, बी हैवी मोलासेस से और सी हैवी मोलासेस से. हर तरीके का चीनी मिलों द्वारा उत्पादित की जाने वाली चीनी की मात्रा पर अलग-अलग असर पड़ता है.
सीधे गन्ने के रस वाले तरीके में गन्ने से निकाले गए पूरे रस को एथेनॉल में बदल दिया जाता है. उस रस से कोई चीनी नहीं बनाई जाती. इसका मतलब है कि उस प्रक्रिया में वह सारी चीनी चली जाती है जिसे निकाला जा सकता था. इस तरीके से 1 टन गन्ने से लगभग 70 से 74 लीटर एथेनॉल मिलता है.
यह तुलना इस वजह से जरूरी है क्योंकि मिलों द्वारा गन्ने के रस या फिर मोलासेस में से किसे एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है इस पर निर्भर करते हुए अलग-अलग परिणाम मिलते हैं. बी हैवी मोलासेस वाले तरीके में चीनी निकालने के पहले चरण के बाद बचे गाढ़े मोलासेस का इस्तेमाल किया जाता है. इसे एथेनॉल बनाने में लगाने से चीनी का उत्पादन लगभग 1.5% से 2% तक कम हो जाता है. इस तरह चीनी का उत्पादन प्रभावित तो होता है लेकिन पूरी तरह बंद नहीं होता. ऐसा इसलिए क्योंकि मोलासेस का इस्तेमाल होने से पहले ही कुछ चीनी निकाली जा चुकी होती है.
सी हैवी मोलासेस वह आखिरी बाय प्रोडक्ट है जो मिलों द्वारा सारी चीनी निकाल लेने के बाद बचता है. इस बचे हुए पदार्थ से एथेनॉल बनाने पर चीनी के उत्पादन में कोई भी नुकसान नहीं होता.
सरकार की नीति में बदलाव
घरेलू चीनी बाजार में कमी को रोकने और कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए सरकार ने 2026-27 सप्लाई वर्ष के दौरान एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के रस, चीनी के सिरप और बी हैवी मोलासेस के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी है. इस नीति को चीनी देने वाले स्रोतों से शून्य डायवर्जन कहा गया है. इस बदलाव के तहत एथेनॉल उत्पादन पूरी तरह से मक्का और चावल पर केंद्रित होने की उम्मीद है ना कि गन्ने से जुड़े इन उत्पादों पर.
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ईंधन और खाद्य प्राथमिकताओं के बीच संतुलन
100% एथेनॉल से चलने वाले वाहनों की आपूर्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, फीडस्टॉक की उपलब्धता की योजना बनाने के महत्व को उजागर करता है. आंकड़ों से यह पता चलता है कि एथेनॉल के उत्पादन में गन्ने का हिस्सा काफी है लेकिन यह कुल मात्रा का एक छोटा हिस्सा ही है. इसी के साथ अनाज से इसका सबसे बड़ा हिस्सा मिलता है.
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