Weather Change: गर्मी का पारा चढ़ते ही क्यों शुरू हो जाता है आंधी-तूफान, समझिए मौसम के बदलने का पूरा विज्ञान
Weather Change in India: मैदानी इलाको में अत्यधिक गर्मी के कारण जब रेत और सड़कों का तापमान 60 से 70 डिग्री सेल्सियस पहुंचता है, तो वहां की हवा हल्की होकर तेजी से ऊपर उठती है और वायुमंडल का संतुलन बिगाड़ देती है.

- ऊपर जाती हवा ठंडी हो बादल बनाती, घर्षण से बिजली कड़कती है.
चिलचिलाती धूप और झुलसाने वाली गर्मी के दिनों में अक्सर दोपहर के बाद मौसम का एक बेहद डरावना और हैरान करने वाला रूप देखने को मिलता है. जब सूरज की तपिश अपने चरम पर होती है, हवा पूरी तरह थम जाती है और जमीन आग उगलने लगती है, तभी अचानक आसमान में धूल का एक विशाल गुबार उठने लगता है. देखते ही देखते काले घने बादल छा जाते हैं और तेज आंधी-तूफान के साथ झमाझम बारिश शुरू हो जाती है. तेज गर्मी के तुरंत बाद आने वाले इस चक्रवाती बदलाव के पीछे प्रकृति और मौसम विज्ञान का एक बहुत ही दिलचस्प और सटीक गणित काम करता है.
धरती का तपना और हवा का ऊपर उठना
आंधी और तूफान के बनने की शुरुआत सूरज की तेज किरणों से धरती के झुलसने के साथ होती है. चिलचिलाती गर्मी में जब धूप सीधे मैदानों पर पड़ती है, तो रेत, पत्थर और डामर से बनी सड़कें बुरी तरह तप जाती हैं और उनका तापमान 60 से 70 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. इस बेहद गर्म सतह के संपर्क में आने से उसके ठीक ऊपर मौजूद हवा भी 40 से 44 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाती है. विज्ञान का नियम है कि गर्म होने पर हवा हल्की हो जाती है, जिसके कारण वह बहुत तेजी से ऊपर की तरफ भागने लगती है और वायुमंडल में एक बड़ी अस्थिरता पैदा कर देती है.
लो-प्रेशर जोन है तूफान का असली इंजन
जब किसी खास इलाके की गर्म हवा तेजी से उठकर ऊपर चली जाती है, तो जमीन के पास एक विशाल वैक्यूम यानी हवा से खाली जगह बन जाती है. मौसम विज्ञान की भाषा में इसे 'लो-प्रेशर जोन' या कम दबाव का क्षेत्र कहा जाता है. प्रकृति का यह नियम है कि हवा हमेशा भारी दबाव वाले क्षेत्र से कम दबाव वाले क्षेत्र की तरफ दौड़ती है. ठीक वैसे ही जैसे किसी फूले हुए गुब्बारे का मुंह खोलने पर हवा तेजी से बाहर भागती है. इस खाली जगह को भरने के लिए आसपास के इलाकों से ठंडी और भारी हवाएं बेहद आक्रामक रफ्तार से केंद्र की तरफ दौड़ पड़ती हैं.
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मैदानी इलाकों में क्यों होता है आंधी का तांडव?
उत्तर भारत के मैदानी राज्यों जैसे राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भयंकर लू के दौरान यह प्रक्रिया सबसे ज्यादा सक्रिय होती है. अत्यधिक गर्मी के कारण जब इन मैदानी भागों में एक बहुत बड़ा लो-प्रेशर जोन तैयार हो जाता है, तो वह आसपास के क्षेत्रों से ठंडी हवाओं को अपनी तरफ खींचता है. खाली स्थान को भरने की यह होड़ इतनी तीव्र होती है कि हवाओं की रफ्तार 50 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच जाती है. यही तेज रफ्तार हवाएं मैदानी इलाकों में अपने साथ भारी धूल उड़ाती हैं, जिसे हम आंधी कहते हैं.
आसमान में कैसे बनते हैं बादल?
जब नीचे से उठी गर्म और नमी से भरी हवा बहुत तेजी से ऊपर जाती है, तो वहां वायुमंडल की ऊपरी ठंडी परतों से टकराती है. ठंडी हवा के संपर्क में आते ही यह नमी पानी की छोटी-छोटी बूंदों में बदलने लगती है, जिससे घने बादलों का निर्माण होता है. गर्मी के दिनों में बनने वाले ये तूफानी बादल बेहद विशाल होते हैं और कभी-कभी आसमान में 10 से 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं. इन बादलों के भीतर का वातावरण इतना अशांत होता है कि अंदरूनी हवाएं 200 किलोमीटर प्रति घंटे की चक्रवाती रफ्तार से घूम रही होती हैं.
बादलों के भीतर कैसे कड़कती है बिजली?
इन विशाल तूफानी बादलों के ऊपरी हिस्से में अत्यधिक ठंड के कारण पानी की बूंदें बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़ों और ओलों में बदल जाती हैं. जब बादल के अंदर बेहद तेज रफ्तार हवाएं चलती हैं, तो ये बर्फ के टुकड़े और पानी की बूंदें आपस में बहुत जोर से टकराती हैं और रगड़ खाती हैं. इस भीषण टकराव और घर्षण से बादलों के भीतर एक बहुत बड़ा स्टेटिक इलेक्ट्रिक चार्ज पैदा होता है. यही चार्ज बिजली के कड़कने और चमकने के रूप में धरती पर दिखाई देता है, जिसके साथ कभी-कभी भारी ओलावृष्टि भी होती है.
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