मिड-डे मील पर हर बच्चे पर कितना खर्च करती है सरकार, सबसे ज्यादा कहां?
देश में मिड-डे मील योजना के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक छात्रों पर केंद्र व राज्य मिलकर खर्चा करते हैं. चलिए जानते हैं कि किस राज्य में यह खर्चा सबसे ज्यादा होता है.

- कुछ राज्य अतिरिक्त पोषण जैसे अंडे, दूध भी देते; पश्चिम बंगाल सर्वाधिक खर्च करता है।
सरकारी स्कूलों में मिलने वाले दोपहर के खाने में अक्सर चर्चाएं देखने देखने को मिलती हैं. हाल ही में पश्चिम बंगाल में इस्कॉन को भोजन की जिम्मेदारी मिलने के बाद उठे सवालों और तमिलनाडु में चिकन बिरयानी के प्रस्ताव ने इस मुद्दे को दोबारा चर्चा में ला दिया है. इन तमान विवादों और नई व्यवस्थाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हमारी सरकारें हर एक बच्चे के भोजन पर प्रतिदिन कितने रुपये खर्चा करती है? चलिए जानें कि हर राज्य में बच्चों की थाली के बजट का पूरा गणित क्या है.
तमिलनाडु और अन्य राज्यों में मिड डे मील का हाल
दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में सरकार बच्चों को दोपहर के भोजन में चिकन बिरयानी परोसने के अनोखे प्रस्ताव पर विचार कर रही है. तमिलनाडु हमेशा से ही स्कूली बच्चों के पोषण के मामले में नए प्रयोग करने के लिए जाना जाता है. देश के विभिन्न राज्य अपनी-अपनी सांस्कृतिक प्राथमिकताओं और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से बच्चों के मेन्यू में बदलाव करते रहते हैं. कहीं दूध और फल दिए जाते हैं तो कहीं उबले अंडे और खास व्यंजन.
शुरुआती कक्षाओं के लिए तय बजट
देश भर के सरकारी स्कूलों में बाल वाटिका से लेकर कक्षा पहली से पांचवीं तक के बच्चों के लिए भोजन की एक न्यूनतम दर तय की गई है. इस प्राथमिक स्तर पर प्रति छात्र रोजाना 6.78 रुपये की राशि खर्च करने का मानक है. इस कुल लागत में केंद्र और राज्य सरकारों की साझेदारी होती है. सामान्य राज्यों में केंद्र सरकार इस राशि का 60 प्रतिशत यानी 4.07 रुपये का योगदान देती है, जबकि बाकी 40 प्रतिशत राशि संबंधित राज्य सरकार अपने खजाने से मिलाती है. इसके अलावा खाना पकाने के लिए लगने वाले अनाज का पूरा खर्च केंद्र उठाता है.
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उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए कितना है बजट?
जब छात्र उच्च प्राथमिक स्तर यानी छठी से आठवीं कक्षा में पहुंच जाते हैं तो उनके शरीर की पोषण संबंधी जरूरतें भी बढ़ जाती हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए भोजन का दैनिक बजट बढ़ाकर 10.17 रुपये प्रति बच्चा तय किया है. इस राशि में भी वित्तीय बंटवारे का वही नियम लागू होता है, जहां केंद्र सरकार अपने 60 प्रतिशत हिस्से के रूप में रोजाना 6.10 रुपये प्रति छात्र मुहैया कराती है और बाकी बची 40 प्रतिशत रकम राज्य सरकारों को अपने राज्य के बजट से देनी पड़ती है.
अंडे, फल और दूध के लिए फंड
कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने अपने-अपने बजट में खास प्रावधान कर रखे हैं, ताकि बच्चों को सामान्य भोजन के अलावा प्रोटीन और विटामिन से भरपूर अतिरिक्त चीजें दी जा सकें. इन राज्यों में बच्चों को हफ्ते में कई दिन उबले अंडे, ताजे केले, उबला हुआ गर्म दूध दिया जाता है. इस तरह से कई बार अतिरिक्त पूरक पोषण का पूरा वित्तीय भार राज्य सरकारें खुद उठाती हैं.
किस राज्य में खर्चा होता है ज्यादा बजट?
अगर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल इस समय लिस्ट में आगे नजर आता है. पश्चिम बंगाल ने प्राथमिक स्कूलों के बच्चों के लिए तय भोजन बजट को 6.78 रुपये से सीधे बढ़ाकर 10 रुपये प्रति छात्र प्रतिदिन कर दिया है. राज्य सरकार के इस कदम से प्राथमिक स्तर के बच्चों को मिलने वाले भोजन की क्वालिटी में सुधार आया है. वहीं, उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए पहले से ही 10.17 रुपये प्रति छात्र की दर से भुगतान किया जा रहा है, जिससे वहां का समग्र बजट काफी बढ़ गया है.
कब हुई थी मिड-डे मील की शुरुआत?
भारत में संचालित होने वाली इस योजना की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को की गई थी. यह व्यवस्था आज दुनिया भर में किसी भी देश द्वारा चलाया जाने वाला सबसे बड़ा मुफ्त भोजन कार्यक्रम बन चुकी है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य करोड़ों गरीब बच्चों को रोजाना कम से कम एक बार गरमा-गरम और पौष्टिक भोजन देना है, ताकि वे बिना किसी आर्थिक या शारीरिक तंगी के अपनी पढ़ाई जारी रख सकें और उनका संपूर्ण विकास अच्छे से हो सके.

मिड-डे मील में पोषण का मानक
सरकारी नियमों के तहत मिड डे मील में खाना देना सिर्फ पेट भरना नहीं काफी नहीं है, बल्कि उसमें पोषण का होना भी अनिवार्य है. प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 5) के बच्चों के लिए हर दिन के भोजन में कम से कम 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन होना जरूरी है. वहीं, बड़ी कक्षाओं यानी छठी से आठवीं के छात्रों के लिए यह मापदंड 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन निर्धारित किया गया है. इस पोषण को पूरा करने के लिए मेन्यू में दाल, मौसमी हरी सब्जियां, चावल और स्थानीय अनाजों का संतुलन रखा जाता है.
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