Xप्लेन: 'वंदे मातरम' से मुसलमानों को दिक्कत क्यों? अल्लाह के सिवा इबादत नामंजूर
Vande Mataram Controversy: भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 के तहत हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की आजादी है. वंदे मातरम को अनिवार्य बनाना इसी अनुच्छेद का उल्लंघन है.

'वंदे मातरम'... ये दो शब्द भारत के हर नागरिक के दिल में देशभक्ति का जज्बा पैदा करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि करोड़ों मुसलमानों के लिए ये दो शब्द एक बड़ी आस्थागत उलझन पैदा करते हैं. जब भी वंदे मातरम का मुद्दा उठता है, तो अक्सर मुसलमानों पर 'देशद्रोही' का लेबल लगा दिया जाता है. इस्लाम की सबसे बुनियादी शिक्षा है- 'लाइलाह इल्लल्लाह' (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं). यह एक ऐसा सिद्धांत है जो हर मुसलमान की रूह में बसता है. जब कोई गीत या नारा इस सिद्धांत से टकराता है, तो वह सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि आस्था का सवाल बन जाता है. तो आइए समझते हैं कि मुसलमानों को वंदे मातरम से दिक्कत क्या है...
वंदे मातरम क्या है?
वंदे मातरम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में लिखा था. यह एक कविता है जो मातृभूमि की महिमा में लिखी गई थी. बाद में इसे भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया. लेकिन यहां एक अहम बात है कि वंदे मातरम के कुल 6 छंद हैं. 1950 में जब इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया, तो तय हुआ कि सिर्फ पहले दो छंद को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाया जाएगा. बाकी के चार छंदों में देवी दुर्गा और लक्ष्मी की स्तुति है. यहीं से शुरू होती है असली कहानी.
मुसलमानों को वंदे मातरम से क्यों दिक्कत है?
जामिया मिलिया इस्लामिया में डिपार्टमेंट ऑफ इस्लामिक स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर जुनैद हारिस इसकी तीन बड़ी वजहें हैं...
1. 'तौहीद' और 'शिर्क' का सवाल
इस्लाम का सबसे बड़ा और बुनियादी सिद्धांत है 'तौहीद' यानी अल्लाह की एकता पर यकीन. इसका मतलब है कि इबादत (पूजा, प्रार्थना, साष्टांग प्रणाम) सिर्फ अल्लाह के लिए है. अल्लाह के सिवा किसी और को पूजना या उसके सामने झुकना 'शिर्क' है, जो इस्लाम में सबसे बड़ा पाप है.
अब वंदे मातरम के बाद के छंदों की बात करें:
- इसमें मातृभूमि को 'दुर्गा' और 'लक्ष्मी' जैसी देवियों के रूप में चित्रित किया गया है.
- कुछ पंक्तियां सीधे तौर पर 'मां, मैं तेरी पूजा करता हूं' कहती हैं.
- 'वंदे' शब्द का अर्थ है 'नमन करना, प्रणाम करना, पूजा करना'.
एक मुसलमान के लिए किसी इंसान या मूर्ति के सामने झुकना, उसे 'मां' कहकर पुकारना और उसकी 'पूजा' करना शिर्क कहलाता है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने साफ कहा, 'वंदे मातरम के छंद इस्लाम के तौहीद के खिलाफ हैं. इसके चार छंदों में मातृभूमि को देवता और दुर्गा माता के समान बताया गया है और इसमें पूजा से जुड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.'

2. सन्यासियों के विद्रोह की कहानी 'आनंदमठ'
बंकिमचंद्र का उपन्यास 'आनंदमठ' सन्यासियों के एक विद्रोह की कहानी है, जो मुस्लिम शासकों के खिलाफ लड़े थे. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस उपन्यास में मुसलमानों को नकारात्मक रूप में दिखाया गया है. हालांकि यह बात विवादित है, लेकिन यह ऐतिहासिक संदर्भ भी कुछ मुसलमानों के मन में एक बेचैनी पैदा करता है.
3. अनिवार्यता का विरोध, गीत का नहीं
यह समझना बहुत जरूरी है कि मुसलमानों को वंदे मातरम गाने से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि इसे अनिवार्य बनाने से आपत्ति है. मौलाना अरशद मदनी का कहना है, 'हमें किसी के वंदे मातरम गाने या सुनाने से कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन एक मुसलमान सिर्फ एक अल्लाह की इबादत करता है और उसके साथ किसी और को नहीं जोड़ सकता.'
AIMIM के प्रवक्ता वारिस पठान ने भी कहा, 'हम वंदे मातरम का सम्मान करते हैं. लेकिन इसकी कुछ पंक्तियां हैं जिन्हें एक मुसलमान नहीं बोल सकता. अगर वे बोली गईं, तो यह इस्लामी मान्यता के अनुसार शिर्क हो जाता है. हम अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत नहीं करते, न ही कभी करेंगे.'
इस्लाम के नजरिए से 'वंदे मातरम' से जुड़े अहम सवाल क्या?
1. क्या वंदे मातरम के दौरान सिर्फ खड़े रहना शिर्क है?
जुनैद हारिस कहते हैं, 'मुसलमानों ने वंदे मातरम गाने से इनकार कर दिया है, क्योंकि हम सिर्फ अल्लाह की इबादत करते हैं. इसके बावजूद अगर वंदे मातरम के लिए खड़ा किया जाए, तो यह उसमें शामिल होने जैसा ही हुआ. इससे बड़ी बात यह कि मुसलमानों के साथ जबरदस्ती की गई, जबकि संविधान धर्म का पालन करने की आजादी का अधिकार देता है.'
2. क्या पहले दो छंद गाना जायज है?
पहले दो छंद 'वंदे मातरम, सुजलां सुफलां...' में किसी देवी-देवता का जिक्र नहीं है. ये मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता की तारीफ हैं. कई मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि पहले दो छंद गाने में कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन बाद के चार छंदों में 'दुर्गा' और 'लक्ष्मी' का जिक्र है, जो शिर्क है.
3. क्या मुसलमान देशभक्त नहीं हैं?
यह सबसे बड़ी गलतफहमी है. मौलाना अरशद मदनी ने कहा, 'मुसलमानों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है. देश से प्यार करना एक बात है, उसकी पूजा करना दूसरी. स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों के बलिदान इतिहास का एक सुनहरा इतिहास हैं.'
जुनैद हारिस ने कहा, 'मुसलमानों का यकीन है कि कायनात का निजाम अल्लाह के हुक्म से चलता है. दुनिया में जो कुछ भी है, वो सब क्रिएशन है और इसका क्रिएटर अल्लाह है. यह सारी क्रिएशन इंसानों की सेवा के लिए है. तो हम क्रिएशन की पूजा क्यों करें यानी हम धरती, पानी और आग जैसी क्रिएशंस की पूजा नहीं करते, बल्कि हम क्रिएटर की उपासना करते हैं. अब इस भक्ति को देश के खिलाफ मानना बेहद दुखद है.'
वारिस पठान ने भी कहा, 'हमारे लोगों ने इस देश की आजादी के लिए अपनी जानें दीं. क्या आप RSS के बारे में बात करेंगे?'
देशभक्ति स्लोगन गाने से नहीं, दिल में होती है. यही मुसलमानों का कहना है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की आजादी है. मुस्लिम नेताओं का कहना है कि वंदे मातरम को अनिवार्य बनाना इसी अनुच्छेद का उल्लंघन है.
राष्ट्रीय गीत बनाम राष्ट्रगान
एक और अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान ('जन गण मन') को अनिवार्य माना है, लेकिन राष्ट्रीय गीत ('वंदे मातरम') को नहीं. वारिस पठान ने कहा, 'हम राष्ट्रगान 'जन गण मन' को पूरे दिल और आत्मा से गाते हैं और उसका सम्मान करते हैं. हम तिरंगे को सलाम करते हैं. अगर आप हम पर कुछ थोपेंगे, तो यह असंवैधानिक होगा.'
अब 2026 के नए बिल में नया विवाद क्या है?
30 जुलाई 2026 को 'प्रीवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (संशोधन) बिल 2026' राज्यसभा के बाद लोकसभा में भी पास हो गया. इस बिल का मकसद वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर कानूनी सुरक्षा देना था. इसने विवाद को और हवा दे दी. अब वंदे मातरम का अपमान करने पर 3 साल की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
























