क्या है देश का मिड-डे मील चार्ट, किन राज्यों में परोसी जाती है सिर्फ वेज थाली?
भारत के राज्यों में मिड-डे मील का मेन्यू हर राज्य के आधार पर तय होता है. कई जगहों पर प्रोटीन के लिए अंडे दिए जाते हैं तो उत्तर भारत के कई राज्यों में केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा जाता है.

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करोड़ों बच्चों की सेहत और शिक्षा को सुधारने के लिए चलाई जा रही मिड-डे मील योजना एक बार फिर से चर्चा में बनी हुई है. पश्चिम बंगाल सरकार के द्वारा इस्कॉन के जरिए बांटे जाने वाले भोजन के साथ अंडा देने का निर्णय और तमिलनाडु में चिकन बिरियानी परोसे जाने के सुझाव ने इस योजना के मेन्यू पर नई बहस छेड़ दी है. वैसे तो देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय खान-पान के हिसाब से स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर थाली का स्वरूप अलग-अलग तय किया जाता है. आइए चलिए जानते हैं कि देश की मिड-डे मील थाली का चार्ट क्या है और किन राज्यों में वेज खाना परोसा जाता है और कहां पर अंडा दिए जानें की परंपरा है.
स्कूलों में मिड-डे मील का क्या है इतिहास?
भारत में स्कूली बच्चों को मुफ्त दोपहर का खाना देने की अवधारणा काफी पुरानी है. इस विचार की पहली आधारशिला आजादी से पहले साल 1920 में मद्रास नगर निगम के द्वारा रखी गई थी. इसके बाद 1956 में तमिलनाडु के तत्कालीन सीएम के. कामराज ने राज्य स्तर पर स्कूल फीडिंग प्रोग्राम की शुरुआत करके एक नई मिसाल कायम की थी. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए केरल में 1961 से चल रहे निजी लंच कार्यक्रम को 1984 में पूरी तरह से राज्य सरकार ने अपने हाथों में ले लिया. विभिन्न राज्यों की इन सफल कोशिशों को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1995 में इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया, जो आज करीब 12 करोड़ बच्चों को कवर करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा भोजन कार्यक्रम बन चुका है.
सरकारी स्कूलों में क्यों मुफ्त में दिया जा रहा खाना?
जिस समय देश में बड़े पैमाने पर इस योजना की नींव रखी गई थी, तब इसका मुख्य लक्ष्य स्कूलों में बच्चों की अनुपस्थिति बढ़ाना और ड्रॉपआउट की दर को कम करना था. इसके साथ ही गरीब परिवारों के बच्चों में पोषण स्तर को सुधारना और कुपोषण की समस्या तो जड़ से खत्म करना था. शुरुआत में तो यह व्यवस्था सिर्फ कक्षा 1 से 5वीं तक के छात्रों के लिए ही लागू की गई थी. लेकिन बाद में बच्चों की शारीरिक वृद्धि और उनकी शैक्षणिक निरंतरता को देखते हुए साल 2007 में केंद्र सरकार ने इसका दायरा बढ़ा दिया और इसे कक्षा 8 तक के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया.
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मेन्यू में बदलाव पर क्यों हो रहा विवाद?
मिड-डे मील योजना का मेन्यू हमेशा से सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है. खाने की गुणवत्ता के अलावा जब भी किसी राज्य में मेन्यू लिस्ट में बदलाव किया जाता है, तो उस पर तीखी बहस होने लगती है. हाल ही में पश्चिम बंगाल में कोलकाता के स्कूलों में इस्कॉन की ओर से सप्लाई होने वाले मिड-डे मील में अंडा शामिल करने के आदेश और तमिलनाडु में हफ्ते में एक दिन चिकन बिरयानी देने के प्रस्ताव ने विवाद को जन्म दिया है. जब भी किसी राज्य में बच्चों की थाली में मांसाहारी घटक जोड़ने या हटाने की बात होती है, तो धार्मिक और पोषण संबंधी तर्क आमने-सामने आ जाते हैं. इसीलिए विवाद शुरू हो जाता है.
किन राज्यों में परोसा जाता है शुद्ध शाकाहारी खाना?
उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों में धार्मिक परंपराओं और स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर केवल शुद्ध शाकाहारी खाना ही परोसा जाता है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गोवा और दिल्ली जैसे राज्यों में स्कूली थाली पूरी तरह वेज है. यहां के मेन्यू में स्थानीय स्वाद के अनुसार रोटी-सब्जी, खिचड़ी, दाल-चावल, कढ़ी, दलिया और हलवा जैसी चीजें शामिल की जाती हैं. इसके साथ ही बच्चों में प्रोटीन और कैल्शियम की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कई राज्य नियमित रूप से पका हुआ गर्म दूध और मौसमी फल भी उपलब्ध कराते हैं.
कहां मिड-डे मील में दिया जाता है अंडा?
पोषण के स्तर को तेजी से बढ़ाने के उद्देश्य से लगभग आधे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपनी मिड-डे मील की थाली में अंडे की उपलब्धता को अनिवार्य कर दिया है. इनमें ज्यादातर साउथ के राज्य आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु शामिल हैं. इसके अलावा उत्तराखंड, बिहार, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम जैसे राज्य शामिल हैं. इसके अलावा जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में भी बच्चों को हफ्ते में कुछ दिन या रोजाना उबले हुए अंडे दिए जाते हैं. कई राज्यों में जो बच्चे अंडा नहीं खाते हैं, उनके लिए स्कूलों में मौसमी फल, गर्म दूध जैसे शाहाहारी विकल्पों का खास इंतजाम किया जाता है.

बच्चों के लिए कैसे होता है कैलोरी और प्रोटीन का निर्धारण?
केंद्र सरकार के नियमों की मानें तो देश के किसी भी राज्य का मेन्यू चाहे जो हो, उसमें पोषक तत्वों की न्यूनतम मात्रा तय होना बेहद जरूरी है. नियमावली के मुताबिक प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 5) के प्रत्येक बच्चे को रोजाना के भोजन से कम से कम 450 कैलोरी ऊर्जा और 12 ग्राम प्रोटीन मिलना चाहिए. वहीं उच्च प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 6 से 8) के विद्यार्थियों के लिए यह मापदंड बढ़ाकर 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन निर्धारित किया गया है. सभी स्कूलों और केंद्रीय रसोईघरों को भोजन तैयार करते समय चावल, दाल, सब्जियों और तेल का संतुलन इसी पोषण गणित के हिसाब से बनाना पड़ता है. जिससे बच्चों की थाली में संपूर्ण आहार आए और उनको पूरा पोषण मिल सके.
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