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कितनी बार लूटा गया कोहिनूर हीरा, अब उसकी कितनी है कीमत?

Kohinoor Diamond History: कोहिनूर हीरा सदियों तक युद्ध, लूट और सत्ता की राजनीति का गवाह बना रहा. आज भी इसकी चमक के साथ एक सवाल यह चमकता है कि इसकी कीमत कितनी है और यह कहां है?

दुनिया के इतिहास में कुछ चीजें सिर्फ दौलत नहीं होतीं, वे सत्ता, संघर्ष और साम्राज्यों के उत्थान-पतन की गवाह बन जाती हैं. कोहिनूर हीरा भी ऐसा ही एक नाम है, जिसे पाने के लिए राजाओं ने युद्ध लड़े, खजाने लुटे और साम्राज्य उजड़ गए. सदियों तक अलग-अलग हाथों में घूमता यह हीरा आज भी दुनिया का सबसे चर्चित रत्न है. सवाल यही है कि कोहिनूर कितनी बार लूटा गया और आज इसकी कीमत आखिर कितनी मानी जाती है?

कोहिनूर सिर्फ हीरा नहीं इतिहास की धरोहर

कोहिनूर हीरा दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और विवादित रत्नों में से एक है. इसे रोशनी का पहाड़ कहा जाता है और इसका इतिहास करीब 700 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है. यह हीरा सिर्फ अपनी चमक के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और ताकत के प्रतीक के तौर पर जाना जाता रहा है. यही वजह है कि जिसने भी इसे पाया, वह खुद को सबसे ताकतवर समझने लगा.

कहां से निकला कोहिनूर?

इतिहासकारों के मुताबिक कोहिनूर हीरा आंध्र प्रदेश में स्थित गोलकुंडा क्षेत्र की कोल्लूर खदान से निकला था. शुरुआती दौर में यह हीरा वारंगल के काकतीय राजवंश के पास था. कहा जाता है कि काकतीय शासकों ने इसे देवी भद्रकाली को अर्पित किया था. उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह हीरा आगे चलकर इतने बड़े संघर्षों का कारण बनेगा.

अलाउद्दीन खिलजी से मुगलों तक

1304 में दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने वारंगल पर हमला कर इस हीरे को अपने कब्जे में ले लिया. इसके बाद यह हीरा दिल्ली सल्तनत के खजाने का हिस्सा बन गया. 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई के बाद मुगल शासक बाबर के हाथ कोहिनूर लगा. मुगलों के दौर में यह हीरा सत्ता की शान बन गया और शाहजहां ने इसे अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया.

नादिर शाह और कोहिनूर नाम

1739 में ईरान के शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया और मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला से कोहिनूर लूट लिया. माना जाता है कि हीरे की चमक देखकर नादिर शाह के मुंह से ‘कोह-ए-नूर’ यानी रोशनी का पहाड़ निकला, और तभी से यह नाम मशहूर हो गया. इसके बाद कोहिनूर ईरान से अफगानिस्तान पहुंचा.

अफगानों से पंजाब तक का सफर

नादिर शाह की हत्या के बाद कोहिनूर अफगान दुर्रानी वंश के पास रहा. बाद में अफगान शासक शुजा शाह दुर्रानी ने यह हीरा सिख साम्राज्य के शासक महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया. रणजीत सिंह के लिए कोहिनूर सबसे कीमती धरोहरों में से एक था और उन्होंने इसे अपने पास सुरक्षित रखा.

अंग्रेजों के हाथ कैसे लगा कोहिनूर?

1849 में दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर कब्जा कर लिया. इसी दौरान कम उम्र के महाराजा दलीप सिंह से कोहिनूर हीरा ले लिया गया. भारत सरकार के अनुसार यह हीरा जबरन छीना गया था. इसके बाद कोहिनूर इंग्लैंड पहुंचा और ब्रिटिश राजघराने की संपत्ति बन गया.

आज कहां है कोहिनूर?

आज कोहिनूर हीरा ब्रिटेन के शाही ताज में जड़ा हुआ है और लंदन के टॉवर में रखा जाता है. यह ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण इसे बेचा नहीं जा सकता, इसलिए इसका कोई आधिकारिक बाजार मूल्य तय नहीं है.

आखिर कितनी है कोहिनूर की कीमत?

हालांकि, कोहिनूर को बेशकीमती माना जाता है, फिर भी विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स में इसकी अनुमानित कीमत 1 बिलियन डॉलर से लेकर 6 बिलियन डॉलर तक बताई जाती है. भारतीय मुद्रा में यह करीब 8,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी जाती है. कुछ आकलनों के मुताबिक इसकी वैल्यू लगभग 1.67 लाख करोड़ रुपये तक मानी गई है.

सोने और बुर्ज खलीफा से तुलना

अगर कोहिनूर की कीमत से तुलना करें तो मौजूदा भाव पर इससे करीब 1600 किलो सोना खरीदा जा सकता है. इतना सोना कई देशों के गोल्ड रिजर्व से भी ज्यादा है. दिलचस्प बात यह है कि दुबई की बुर्ज खलीफा लगभग 12,500 करोड़ रुपये में बनी थी, यानी कोहिनूर की कीमत में करीब 13 बुर्ज खलीफा खड़ी की जा सकती हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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