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अपने साथ कितने सैनेटरी नैपकिन लेकर जाती हैं महिला एस्ट्रोनाट्स, स्पेस में कैसे रोकती हैं पीरियड्स?

नासा भी स्पेस में महिला एस्ट्रोनॉट्स के पीरियड्स संबंधी सवालों का सामना कर रहा है. शुरुआत में अनुमान लगाया गया था कि महिलाओं को ऐसे समय में हर सप्ताह 100 से 200 सैनेटरी नैपकिन की जरूरत होगी.

पीरियड्स (मासिक धर्म) हर महिला के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होता है. इस दौरान पांच दिनों तक महिलओं को भयानक दर्द तो होता ही है, साथ ही उनके लिए हाइजीन मेनटेन करना भी काफी मुश्किल भरा होता है. हालांकि, पीरियड्स महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होते हैं और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करते हैं, लेकिन क्या आपने सोचा है कि अंतरिक्ष में जाने वाली महिला एस्ट्रोनॉट्स पीरियड्स जैसी चुनौती से कैसे बचती हैं? 

हाल ही में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से धरती पर लौटीं सुनीता विलियम्स आठ दिन के लिए अंतरिक्ष गई थीं, लेकिन उन्हें नौ महीने से ज्यादा समय तक वहां रहना पड़ा. सुनीता विलियम्स जैसी कई एस्ट्रोनॉट्स हैं, जो लंबे समय तक अंतरिक्ष में  ट्रैवल हैं. ऐसे में स्पेस के रेडिएशन की वजह से उनके पीरियड्स पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही उनके लिए यह समय काफी चुनौती भरा हो जाता है? ऐसे में आइए जानते हैं कि महिला एस्ट्रोनॉट्स स्पेस में ट्रैवल के दौरान अपने साथ कितने सैनेटरी नैपकिन लेकर जाती हैं और पीरियड्स की चुनौती को कैसे पार करती हैं.  

कितने सैनेटरी नैपकिन की पड़ती है जरूरत

बता दें, अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला सोवियत संघ की वेलेंतीन तेरेश्कोवा थीं, उन्होंने 1963 में अंतरिक्ष की यात्रा की थी. इसके 20 साल बाद नासा ने अपनी पहली महिला अंतरिक्ष यात्री सैली राइड को अंतरिक्ष में भेजा था. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, नासा भी स्पेस में महिला एस्ट्रोनॉट्स के पीरियड्स संबंधी सवालों का सामना कर रहा है. शुरुआत में अनुमान लगाया गया था कि महिलाओं को ऐसे समय में हर सप्ताह 100 से 200 सैनेटरी नैपकिन की जरूरत होगी, लेकिन बाद में पता चला कि उन्हें इतने पैड्स की जरूरत नहीं थी. 

कैसे रोकती हैं पीरियड्स

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंतरिक्ष में ट्रैवल करने वाली महिला अंतरिक्ष यात्री वर्तमान में गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं. इसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिसमें आगे उन्हें मां बनने में परेशानी आती है. यहां एक बात और गौर करने वाली है कि अंतरिक्ष में जाने वाली महिलाओं की औसत उम्र 38 साल है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अंतरिक्ष में होने वाले रेडिएशन का असर महिला और पुरुष अंतरिक्ष यात्रियों पर समान रूप से पड़ता है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है. हालांकि, इस संबंध में कोई दीर्घकालिक अध्ययन नहीं हुआ है. भविष्य में ऐसी समस्या से बचने के लिए महिलाएं अपने अंडाणु और पुरुष अंतरिक्ष यात्री शुक्राणुओं को संरक्षित करा सकते हैं. 

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प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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