सोना, चांदी, एल्युमीनियम... एक स्मार्टफोन में कितने मेटल लगते हैं?
एक स्मार्टफोन को बनाने में सोना, चांदी और तांबे समेत लगभग 60 तरह की धातुएं लगती हैं, जिससे पुराने मोबाइल ई-कचरे के रूप में बहुमूल्य संसाधनों का बड़ा जरिया बन चुके हैं.

आजकल स्मार्टफोन हर इंसान की जिंदगी का एक अटूट हिस्सा बन चुका है. लोग इसे महज कॉलिंग, मैसेजिंग या इंटरनेट चलाने वाला एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस समझते हैं, जो बाहर से प्लास्टिक या कांच का दिखाई देता है. लेकिन बेहद कम लोग यह बात जानते हैं कि इस छोटे से गैजेट को बनाने में दुनिया की कई बहुमूल्य धातुओं और प्राकृतिक खनिजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह है कि पुराना या खराब हो चुका मोबाइल फोन केवल कबाड़ नहीं, बल्कि कीमती धातुओं का एक बड़ा स्रोत होता है.
साधारण फोन में 60 तरह के मेटल
एक सामान्य स्मार्टफोन को पूरी तरह तैयार करने में करीब 60 अलग-अलग किस्म की धातुओं और खनिजों की जरूरत पड़ती है. ये धातुएं मोबाइल के अंदर बिजली के प्रवाह को सही दिशा देने, गर्मी को नियंत्रित करने और डिवाइस की गति को बेहतर बनाए रखने का काम करती हैं. अगर किसी आईफोन या प्रीमियम फोन की बात करें तो उसकी बॉडी से लेकर अंदरूनी चिप्स तक में ऐसी-ऐसी धातुओं की मिलावट होती है, जिनकी खानों से खुदाई करना बेहद जटिल काम माना जाता है.
सर्किट बोर्ड से फ्रेम तक धातुओं का उपयोग
मोबाइल फोन के अलग-अलग हिस्सों में उनकी क्षमता के हिसाब से अलग-अलग धातुएं लगाई जाती हैं-
सोना- जंग न लगने और बिजली का बेहतरीन सुचालक होने के कारण फोन के मदरबोर्ड, सर्किट, सिम स्लॉट, चार्जिंग पोर्ट और कैमरा कनेक्टर पर सोने की बेहद पतली परत चढ़ाई जाती है. एक औसतन फोन में लगभग 0.034 ग्राम सोना मौजूद होता है.
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चांदी- इलेक्ट्रिकल स्विच और सर्किट के रास्तों को आपस में जोड़ने के लिए चांदी का उपयोग होता है. प्रति स्मार्टफोन लगभग 0.34 ग्राम चांदी लगाई जाती है.
एल्युमीनियम- फोन को बाहर से मजबूती देने और उसका वजन हल्का रखने के लिए उसके आउटर फ्रेम और बॉडी में सबसे ज्यादा, यानी करीब 25 ग्राम एल्युमीनियम इस्तेमाल होता है.
तांबा- अंदरूनी वायरिंग, कॉइल और सर्किट बोर्ड की बनावट के लिए औसतन 15 ग्राम तांबे की खपत होती है.
लिथियम और कोबाल्ट- इन दोनों धातुओं का मुख्य काम फोन की बैटरी को जल्दी चार्ज करना और बिजली की खपत को स्टोर करके रखना होता है.
दुर्लभ खनिज और अन्य कीमती तत्व
स्मार्टफोन में सिर्फ सामान्य धातुएं ही नहीं, बल्कि कई 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' यानी दुर्लभ तत्व भी शामिल होते हैं. जैसे स्पीकर और वाइब्रेशन मोटर को सही कंपन देने के लिए नियोडिमियम का उपयोग होता है. इसके अलावा फोन के डिस्प्ले और सेंसर्स में लेंथानम, टर्बियम, गेडोलिनियम और प्रेसियोडीमियम जैसे जटिल खनिज मिलाए जाते हैं. साथ ही प्लेटिनम, टंगस्टन, निकल और 0.015 ग्राम पैलेडियम जैसी महंगी धातुएं भी फोन का हिस्सा बनती हैं.
खानों से ज्यादा सोना फोन के कचरे में
अगर एक टन प्राकृतिक सोने के अयस्क (कच्ची धातु) से निकलने वाले सोने की तुलना एक टन इस्तेमाल किए गए आईफोन के कचरे से की जाए, तो आईफोन के कचरे से 300 गुना ज्यादा सोना हासिल किया जा सकता है. इसी तरह एक टन चांदी के अयस्क की तुलना में बेकार आईफोन से 6.5 गुना अधिक चांदी निकाली जा सकती है. इससे साफ जाहिर होता है कि इलेक्ट्रॉनिक्स के कचरे में धातुओं की सघनता प्राकृतिक खदानों से भी कहीं अधिक है.
लाखों आईफोन से निकल सकता है भारी खजाना
किसी एक फोन से व्यक्तिगत स्तर पर सोना या चांदी निकालना मुमकिन नहीं है, क्योंकि प्रति यूनिट इनकी मात्रा काफी कम होती है. लेकिन जब बड़े स्तर यानी रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री के नजरिए से देखा जाए तो इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं. अगर दस लाख आईफोन को एक साथ रीसायकल किया जाए, तो उनसे लगभग 34 किलोग्राम शुद्ध सोना, 350 किलोग्राम चांदी, 16 टन तांबा और 15 किलोग्राम दुर्लभ पैलेडियम आसानी से निकाला जा सकता है.
ई-कचरा और रीसाइक्लिंग की बड़ी चुनौती
दुनिया भर में हर साल करीब 2 अरब लोग अपने पुराने फोन को बदलकर नया मॉडल खरीदते हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि हर साल 2 अरब पुराने फोन या तो अलमारियों के दराजों में बंद होकर रह जाते हैं या कचरे के ढेर में फेंक दिए जाते हैं. चिंता की बात यह है कि दुनिया भर में पैदा होने वाले इस ई-कचरे में से केवल 10 फीसदी फोन ही सही तरीके से रीसायकल हो पाते हैं. स्मार्टफोन के अलावा पुराने कंप्यूटर, टीवी, गेमिंग कंसोल और बड़े सर्वर्स के मदरबोर्ड में भी काफी मात्रा में सोना और तांबा होता है, जिनका निपटान सही तरीके से न होना पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है.
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