नौकरी नहीं मिलने पर हर साल कितने लोग करते हैं सुसाइड?
नौकरी न मिलने का दबाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है. साई प्रदीप की मौत ने बेरोजगारी और करियर तनाव पर सवाल उठाए हैं.

अक्सर हर दूसरे दिन एक ऐसी खबर सुनने को मिल जाती है, जिसे सुनकर हर किसी की सांसें थम सी जाती हैं, जैसे किसी का हत्या कर देना या फिर किसी ने अपने आप ही आत्महत्या करके खुद की जान ले ली होती है. ज्यादातर लोगों को लगता है कि भारत में ही युवा पढ़ाई में फेल हो जाने से या नौकरी न लगने से सुसाइड कर लेता है, लेकिन आपको बता दें कि ये स्थिति केवल भारत में रह रहे लोगों के साथ नहीं होती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि अमेरिका के सैन एंटोनियो शहर में हैदराबाद के एक युवक साई प्रदीप की मौत की खबर ने सबको झकझोर दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह युवक अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद भी नौकरी नहीं ढूंढ पाया, जिसके बाद उसने अपनी जान दे दी. परिवार और भारतीय समुदाय के लोगों ने बताया कि वह कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद कई महीनों से नौकरी की तलाश में जूझ रहा था. इससे पहले वह अमेजन कंपनी में हैदराबाद में काम कर चुका था, लेकिन अमेरिका जाने के बाद रोजगार न मिलने की चिंता उसे अंदर ही अंदर तोड़ती चली गई. इस घटना के बाद हर किसी के दिमाग में ये सवाल उठ रहा है कि आखिर नौकरी न मिलने के दबाव में हर साल कितने लोग अपनी जान गंवा देते हैं. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
आंकड़े क्या कहते हैं बेरोजगारी और सुसाइड को लेकर
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 में देशभर में कुल 1,71,418 सुसाइड के मामले दर्ज हुए, जो 2022 के मुकाबले थोड़ी ज्यादा संख्या है. इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा मामले पारिवारिक समस्याओं और बीमारी की वजह से सामने आए. वहीं बेरोजगारी को कारण मानते हुए करीब 1.8 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए, यानी अनुमानित तौर पर हर साल तीन हजार से ज्यादा लोग सिर्फ नौकरी न मिलने या रोजगार छूटने की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं. इसके अलावा करियर से जुड़ी समस्याओं के चलते भी करीब 1.1 प्रतिशत मामले दर्ज हुए. यह आंकड़े बताते हैं कि नौकरी की चिंता आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा असर डाल रही है, खासकर पढ़े-लिखे युवाओं में यह दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
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क्यों बढ़ रहा है यह दबाव और क्या किया जा सकता है
इस जानकारी के बाद हर किसी के दिमाग में ये सवाल आता है कि आखिर इन बढ़ते मामलों के पीछे की वजह क्या है, तो ऐसे आपको बता दें कि इस विषय पर विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में डिग्री हासिल कर लेने के बाद भी सही नौकरी न मिल पाना युवाओं में भारी निराशा पैदा कर देता है. खासकर विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले छात्रों पर परिवार और समाज की उम्मीदों का दबाव भी काफी ज्यादा होता है, जिससे असफलता का डर उन्हें अकेला महसूस कराने लगता है. मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जानकार बार-बार यह सलाह देते हैं कि नौकरी न मिलना या करियर में देरी होना जिंदगी का अंत नहीं है, बल्कि यह एक अस्थायी दौर है, जिससे सही मदद और सही सोच के साथ बाहर निकला जा सकता है. परिवार और दोस्तों की भूमिका इस समय बेहद अहम हो जाती है, क्योंकि खुलकर बात करने और सही समय पर मदद लेने से कई बार बड़ी अनहोनी को टाला जा सकता है.
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