किन-किन देशों को कनेक्ट कर रहा चीन का गोल्डन बॉर्डर, भारत के लिए कितना खतरा?
China Golden Border: चीन एक रोड नेटवर्क बनाने की तैयारी कर रहा है. आइए जानते हैं कि इससे भारत को क्या खतरा है.

- चीन 27000 किमी का 'गोल्डन बॉर्डर' रोड नेटवर्क बना रहा है।
- G219 हाईवे भारत समेत 12 देशों के करीब से गुजरता है।
- भारत को सीमा पर सैन्य लॉजिस्टिक्स उपयोग की चिंता है।
- यह नेटवर्क सीमावर्ती इलाकों में चीन की पहुंच बढ़ाएगा।
China Golden Border: चीन काफी बड़ा रोड नेटवर्क बनाने की योजना बना रहा है जो इसकी जमीनी सीमाओं और समुद्र तट को जोड़ेगा. चीनी सरकारी मीडिया ने इस प्रोजेक्ट को गोल्डन बॉर्डर कोस्ट लूप कहा है. यह लगभग 27000 किलोमीटर लंबा नेटवर्क है. बीजिंग का ऐसा कहना है कि यह प्रोजेक्ट दूर दराज के सीमावर्ती इलाके में आर्थिक विकास, पर्यटन और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देगा. हालांकि क्योंकि इस नेटवर्क के कई हिस्से भारत की सीमा के करीब से गुजरते हैं इस वजह से भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों का ध्यान भी इस प्रोजेक्ट पर गया है.
चीन का बॉर्डर हाईवे किन देशों को जोड़ेगा?
इस प्रोजेक्ट का सबसे रणनीतिक रूप से जरूरी हिस्सा जी219 हाईवे है. यह लगभग 10000 किलोमीटर लंबा है. यह 12 देशों की सीमाओं के करीब से गुजरता है. इनमें भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, वियतनाम, लाओस, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान और रूस शामिल हैं. एक और बड़ा हिस्सा जी331, मंगोलिया और उत्तर कोरिया के साथ चीन की उत्तरी सीमाओं के साथ-साथ चलता है. तीसरा मुख्य रूट जी228 चीन के समुद्र तट के साथ-साथ चलता है और जरूरी तटीय क्षेत्रों और औद्योगिक केन्द्रों को जोड़ता है. ये सभी हाईवे मिलकर चीन की भौगोलिक सीमा के चारों तरफ एक बड़ा ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क बनाते हैं.

भारत के लिए क्यों जरूरी?
चीन आधिकारिक तौर पर इस प्रोजेक्ट को मुख्य रूप से एक आर्थिक और विकास संबंधी पहल के रूप में पेश करता है. बेहतर सड़क से पर्यटन बढ़ सकता है, ट्रांसपोर्टेशन में सुधार हो सकता है और दूर दराज के सीमावर्ती इलाकों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है. लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर का नागरिक और रणनीतिक दोनों तरह का महत्व होता है. शांति के समय कॉमर्शियल ट्रांसपोर्टेशन के लिए बनाई गई सड़क सैन्य संकट के समय एक जरूरी लॉजिस्टिकल रूट भी बन सकती है.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास के इलाकों से इस नेटवर्क की निकटता है. चीन के पश्चिमी और पूर्वी सीमावर्ती इलाके, खासकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश से जुड़े इलाके, भारत चीन सीमा विवाद के अनसुलझे होने की वजह से रणनीतिक रूप से संवेदनशील हैं.
क्या चीन इन सड़क का इस्तेमाल सैन्य आवाजाही के लिए कर सकता है?
सबसे बड़ी रणनीतिक चिंताओं में से एक लॉजिस्टिक्स है. पहाड़ी सीमावर्ती इलाके में सैनिक ईंधन, गोला बारूद, गाड़ी और दूसरी जरूरी चीजों को लाना ले जाना मुश्किल होता है. सड़कों का बेहतर नेटवर्क होने से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी संवेदनशील इलाके में अपने सैनिक और साजों सामान को तेजी से पहुंचा सकती है.
इस नेटवर्क से चीन की दूर दराज के इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने, निगरानी करने और सप्लाई जारी रखने की क्षमता भी बेहतर हो सकती है. यह बात तब और भी जरूरी हो जाती है जब सीमा पर लंबे समय तक तनाव बना रहे.

लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक
जब इस रास्ते को भौगोलिक नजरिए से देखा जाता है तो इसकी रणनीतिक अहमियत और साफ हो जाती है. चीन का सीमावर्ती इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के पश्चिमी और पूर्वी सेक्टर से सटे इलाकों तक फैला हुआ है. पश्चिम में अक्साई चिन और लद्दाख के आसपास के इलाके काफी संवेदनशील हैं. पूर्व में तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के सामने वाले इलाकों में चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर भी भारत की पैनी नजर रही है. इस वजह से हर मौसम में काम आने वाले सड़कों का बड़ा नेटवर्क इन मुश्किल पहाड़ी इलाकों में चीन की लॉजिस्टिकल कनेक्टिविटी को मजबूत कर सकता है.
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क्या यह चीन की घेराबंदी की रणनीति का हिस्सा है?
भारत के पड़ोस में चीन के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और रणनीतिक रिश्तों के साथ-साथ गोल्डन बॉर्डर की भी चर्चा हो रही है. पाकिस्तान, म्यांमार और दूसरे देशों के साथ चीन की आर्थिक और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी गतिविधि को भारतीय रणनीतिकार अक्सर बीजिंग के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव के नजरिए से देखते रहे हैं. इस वजह से चीन पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर, म्यांमार में चीन का इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और हिंद महासागर के आसपास उसकी मौजूदगी रणनीतिक नजरिए से काफी जरूरी है. हालांकि 27000 किलोमीटर लंबे इस पूरे नेटवर्क को भारत की सोची समझी सैन्य घेराबंदी कहना चीन के बताए गए मकसद से आगे की बात होगी.
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