कब और किसने की थी लालबागचा राजा की पहली स्थापना, जानें इसकी पूरी कहानी
Ganesh Chaturthi 2026: देशभर में आज गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जा रहा है. आइए जानते हैं मुंबई के लालबागचा राजा के इतिहास के बारे में. जानें कब हुई थी लालबागचा राजा की पहली स्थापना.

- 1930s बाजार बंदी से, मछुआरे-व्यापारी गंभीर संकट में थे।
- स्थायी जगह मिलने पर मन्नत पूरी हुई, 1934 में मूर्ति स्थापित।
- पहली मूर्ति मिट्टी की, कोली मछुआरा परिधान में सजी।
- कांबली परिवार 1935 से लालबागचा राजा की मूर्ति बनाता।
Ganesh Chaturthi 2026: पूरे भारत में गणेश चतुर्थी का त्योहार काफी ज्यादा श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है. घरों से लेकर बड़े-बड़े सार्वजनिक पंडालों तक भक्त भगवान गणेश का स्वागत करते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना करते हैं. गणेश जी की सबसे मशहूर मूर्तियों में से एक है 'लालबागचा राजा'. इसका इतिहास मुंबई के मजदूरों, मछुआरों और व्यापारियों के संघर्षों से गहराई से जुड़ा है. लेकिन लालबागचा राजा की स्थापना पहली बार कब हुई थी और इसे स्थापित करने के पीछे कौन था? आइए जानते हैं क्या है इसकी कहानी.
लालबागचा राजा की पहली स्थापना
लालबागचा राजा की पहली स्थापना 12 सितंबर 1934 को मुंबई के लालबाग परेल इलाके में हुई थी. स्थानीय मछुआरों, व्यापारियों और मिल मजदूरों ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई. साथ ही कुंवर जी जेठाभाई शाह, श्यामराव विष्णु बोधे, रामचंद्र तावड़े, वी.बी.कोरगांवकर और नखावा कोकम मामा जैसे स्थानीय नेताओं और निवासियों ने सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की स्थापना में मदद किया.

लालबाग के मजदूरों और व्यापारियों के सामने संकट
लालबागचा राजा की शुरुआत को समझने के लिए 1930 के दशक की शुरुआत में मुंबई की स्थिति को देखना जरूरी है. लालबाग उस इलाके का हिस्सा था जिसे गिरनगांव या मिलों का गांव कहा जाता था. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां टेक्सटाइल मिलें और मजदूर बड़ी संख्या में थे.
1932 में आर्थिक मुश्किलों और औद्योगिक बदलावों की वजह से पेरू चाल का पुराना बाजार बंद हो गया. इस बंदी का बुरा असर उन मछुआरों, फेरीवालों और छोटे व्यापारियों पर पड़ा जो अपनी आजीविका के लिए इस बाजार पर निर्भर थे. इनमें से कई लोग पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर थे और कारोबार की अपनी नियमित जगह छिन जाने से उनके परिवारों के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो गई.
व्यापारियों और मछुआरों ने बप्पा से मन्नत मांगी
इस मुश्किल दौर में बेघर हुए व्यापारियों और कोली मछुआरों ने भगवान गणेश से एक नवस यानी धार्मिक मन्नत मांगी. उन्होंने प्रार्थना की कि अगर उन्हें कोई स्थायी जगह मिल जाए जहां वे अपना कारोबार कर सकें तो वे सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन करेंगे और आभार जताने के लिए वहां गणपति बप्पा की स्थापना करेंगे.
यह मन्नत आगे चलकर लालबाग की कहानी का एक जरूरी हिस्सा बन गई. इसने इस त्योहार को समुदाय की आजीविका और स्थायी बाजार के संघर्ष से सीधे तौर पर जोड़ दिया.

लालबागचा राजा की पहली स्थापना कैसे हुई?
विस्थापित व्यापारियों के लिए सही जगह खोजने की कोशिश स्थानीय लोगों और नेताओं ने जारी रखी. उनकी कोशिश तब सफल हुई जब जमीन के मालिक रजाबाई तैयबअली ने बाजार के लिए जमीन देने पर सहमति जताई. एक पक्की जगह मिलने के बाद समुदाय ने भगवान गणेश से किया अपना वादा पूरा किया.
12 सितंबर 1934 को नए बने स्थानीय बाजार के एक हिस्से में गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित की गई. यह उस चीज की शुरुआत थी जो बाद में लालबागचा राजा के नाम से मशहूर हुई. इस तरह पहली स्थापना सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं थी. यह आर्थिक तंगी के समय समुदाय द्वारा ली गई मन्नत के पूरा होने का प्रतीक थी.
लालबागचा राजा की पहली मूर्ति कैसी दिखती थी?
असली मूर्ति आज लालबागचा राजा की जो शानदार छवि है उससे काफी अलग थी. 1934 में मूर्ति काफी छोटी थी और मिट्टी से बनी थी. इसे मुंबई के कोली मछुआरा समुदाय के पारंपरिक कपड़ों में सजाया गया था जिसमें धोती और टोपी शामिल थीं. साधारण रूप रंग इस त्योहार की साधारण शुरुआत और स्थानीय कामकाजी वर्ग के समुदाय के साथ इसके जुड़ाव को दर्शाता था.
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कांबली परिवार लालबागचा राजा से कब जुड़ा?
लालबागचा राजा की मूर्ति बनाने की परंपरा 1935 से कांबली परिवार से जुड़ गई. उस साल मधुसूदन कांबली ने मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी ली. बस तभी से कांबली परिवार की पीढ़ी मशहूर गणपति मूर्ति को आकार देने की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. यह जुड़ाव 9 दशकों से ज्यादा समय से चला आ रहा है और लालबागचा राजा से जुड़ी खास परंपराओं में से एक बन चुका है.
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