मुसलमान अगर हिंदू बन जाए, क्या तब भी मिलेगा आरक्षण का लाभ?
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसलों के अनुसार, जानिए कि क्या इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म अपनाने या हिंदू बनने पर व्यक्ति को अपनी मूल जाति के तहत आरक्षण का अधिकार वापस मिल सकता है या नहीं?

भारत में धर्म परिवर्तन और उससे जुड़े कानूनी अधिकारों को लेकर अक्सर बड़ी बहस छिड़ जाती है. हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने एक ऐसा ही संवेदनशील मामला आया, जिसने इस चर्चा को दोबारा गरमा दिया है. अदालत के सामने यह सवाल उठा कि क्या कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेता है, तो क्या उसे पहले वाले धर्म या जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा? इस विषय पर देश के संविधान, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और विभिन्न राज्यों के नियमों में बेहद स्पष्ट और कड़े प्रावधान किए गए हैं, जिन्हें हर नागरिक के लिए समझना जरूरी है.
अनुसूचित जाति के लिए क्या है संवैधानिक नियम?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत जारी किए गए राष्ट्रपति के आदेश 1950 के मुताबिक, अनुसूचित जाति SC का दर्जा केवल उन लोगों को मिल सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं. इस कानून के तहत यदि कोई दलित व्यक्ति इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति SC के तहत मिलने वाले आरक्षण का अधिकार खो देता है.
लेकिन कानून का दूसरा पहलू यह भी कहता है कि यदि कोई व्यक्ति वापस हिंदू धर्म में घर वापसी करता है और उसका समाज उसे अपनी पुरानी जाति के रूप में स्वीकार कर लेता है, तो वह दोबारा SC आरक्षण के लाभ का दावा कर सकता है.
OBC कैटेगरी में धर्म बदलने पर क्या होता है?
OBC आरक्षण के नियम अनुसूचित जाति से थोड़े अलग हैं. केंद्र और कई राज्यों की ओबीसी लिस्ट में कुछ मुस्लिम जातियों जैसे जुलाहा, कूंजड़ा, धुनिया आदि को भी शामिल किया गया है. यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति OBC कैटेगरी के तहत आरक्षण का लाभ ले रहा है और वह हिंदू धर्म अपना लेता है, तो उसका आरक्षण सीधे तौर पर खत्म नहीं होता.
बशर्ते, वह हिंदू धर्म में शामिल होने के बाद भी किसी ऐसी जाति का हिस्सा बने जो पहले से OBC लिस्ट में नोटिफाइड हो. ओबीसी का पैमाना सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर आधारित होता है, इसलिए इसमें पूरी तरह से धर्म बदलने पर भी जातिगत स्थिति की समीक्षा की जाती है.
ST के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख
ST वर्ग के लिए धर्म परिवर्तन के नियम पूरी तरह से अलग और बेहद कड़े हैं. हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान साफ किया कि ST का दर्जा किसी व्यक्ति के धर्म पर नहीं, बल्कि उसकी जनजातीय पहचान, संस्कृति, रीति-रिवाजों और खान-पान पर निर्भर करता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई ST वर्ग का व्यक्ति अपना धर्म बदल भी लेता है, तब भी उसका ST का स्टेटस खत्म नहीं होता है क्योंकि उसकी जनजातीय पहचान नहीं बदलती. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई गैर-एसटी व्यक्ति धर्म बदलकर इस कोटे का नाजायज फायदा उठा सके.
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों में साफ कहा है कि केवल कागजों पर धर्म बदल लेने से किसी को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता. अगर कोई मुसलमान हिंदू बनता है और वह पुरानी जाति के आधार पर आरक्षण का दावा करता है, तो उसे दो बातें साबित करनी होंगी. पहली यह कि वह मूल रूप से उसी जाति से ताल्लुक रखता था और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हिंदू समाज और उसकी संबंधित जाति के लोगों ने उसे पूरी तरह से अपने बीच स्वीकार कर लिया है. इन कड़े नियमों के बिना आरक्षण का लाभ मिलना कानूनी रूप से असंभव है.
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