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क्या सहारा डेजर्ट में सोलर पैनल लगाकर बना सकते हैं बिजली, जानें इसके पीछे का विज्ञान?

Sahara Solar: क्या आपने कभी सोचा है कि सहारा रेगिस्तान में इतनी धूप है तो वहां अगर सोलर पैनल लगा दिया जाए तो कितनी बिजली बनेगी? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • उत्पादित बिजली के लिए लंबी दूरी का वितरण नेटवर्क आवश्यक होगा।

Sahara Solar: सहारा रेगिस्तान में सोलर पावर से काफी ज्यादा बिजली पैदा करने की क्षमता है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर सहारा के लगभग 90 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके के सिर्फ 1.2% हिस्से को हाई एफिशिएंसी वाले सोलर पैनल से ढक दिया जाए तो सैद्धांतिक रूप से इतनी बिजली पैदा हो सकती है जो दुनिया की कुल बिजली की जरूरत को पूरा कर सके. यह आइडिया सुनने में तो आसान लग सकता है लेकिन इस बड़ी क्षमता को एक प्रैक्टिकल ग्लोबल एनर्जी प्रोजेक्ट में बदलने में वैज्ञानिक, पर्यावरण से जुड़े, तकनीकी और जियोपोलिटिकल जैसे मुश्किल चैलेंज जा सकते हैं.

सहारा सोलर पावर के लिए क्यों सही है? 

सहारा दुनिया का सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान है और यहां साल के ज्यादातर समय तेज धूप रहती है. इसकी बड़ी खुली जगहें सोलर फार्म लगाने के लिए काफी बड़ी जगह देती हैं. एक और फायदा यहां आबादी का घनत्व कम होना है. घनी आबादी वाले इलाकों की तुलना में बड़े पैमाने पर इंस्टॉलेशन में लोगों के विस्थापन और जमीन के इस्तेमाल को लेकर होने वाले झगड़ों जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं. 


क्या सहारा डेजर्ट में सोलर पैनल लगाकर बना सकते हैं बिजली, जानें इसके पीछे का विज्ञान?

सोलर पैनल बिजली कैसे बनाते हैं? 

सोलर पैनल फोटोवोल्टिक इफेक्ट के जरिए बिजली बनाते हैं. जब सूरज की रोशनी सोलर पैनल के अंदर मौजूद सिलिकॉन सेल पर पड़ती है तो फोटॉन अपनी एनर्जी इलेक्ट्रॉन को ट्रांसफर करते हैं. इससे वे हिलने-डुलने लगते हैं.

इलेक्ट्रॉन की इस हरकत से डायरेक्ट करंट बिजली बनती है. ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर इलेक्ट्रिकल ग्रिड अल्टरनेटिंग करंट पर काम करते हैं. इस वजह से घर, इंडस्ट्री और दूसरे ग्राहकों तक बिजली पहुंचाने से पहले एक इनवर्टर डीसी बिजली को एसी पावर में बदलता है. इस वजह से सहारा की तेज धूप एनर्जी का एक काफी बड़ा प्राकृतिक स्रोत है.

अगर सहारा के बड़े हिस्से को सोलर पैनल से ढक दिया जाए तो क्या होगा?

बड़े पैमाने पर सोलर इंस्टॉलेशन का असर सिर्फ बिजली बनाने तक ही सीमित नहीं रहेगा. सहारा की चमकदार रेत अपनी ज्यादा एल्बीडो की वजह से सूरज की आने वाली रोशनी के एक बड़े हिस्से को प्राकृतिक रूप से रिफ्लेक्ट कर देती है. 

इसके उलट सोलर पैनल आमतौर पर गहरे रंग के होते हैं और ज्यादा सोलर एनर्जी सोखते हैं. इस वजह से रिफ्लेक्ट करने वाली रेत की जगह गहरे रंग की पैनल लगाने से सतह पर सोखी जाने वाली सोलर एनर्जी की मात्रा बदल सकती है.

एक संभावित नतीजा इलाके में और ज्यादा गर्मी बढ़ना हो सकता है. ज्यादा गर्मी से हवा के दबाव का वायुमंडल के सर्कुलेशन पर असर पड़ सकता है. इससे नमी वाली हवा इस इलाके की तरफ खींची चली आ सकती है और बारिश बढ़ सकती है.


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चार बड़ी चुनौतियां 

काफी ज्यादा गर्मी से क्षमता कम हो जाती है 

सोलर पैनल आमतौर पर सामान्य तापमान पर सबसे अच्छा काम करते हैं. उनकी क्षमता को अक्सर 25 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर मापा जाता है. सहारा में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से 50 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा हो सकता है. जैसे-जैसे फोटोवोल्टिक सेल का ऑपरेटिंग तापमान बढ़ता है उनकी क्षमता कम हो जाती है. इस वजह से भरपूर धूप का मतलब हमेशा ज्यादा बिजली का उत्पादन नहीं होता. 

धूल और रेतीले तूफान 

धूल एक और बड़ी समस्या है. फोटोवोल्टिक पैनल पर जमा होने वाली रेत और धूल धूप को रोक सकती है और बिजली के उत्पादन को कम कर सकती है. लगातार सफाई जरूरी होगी लेकिन रेगिस्तान में लाखों पैनलों की सफाई के लिए काफी ज्यादा पानी और बेहतर रखरखाव सिस्टम की जरूरत होगी. रेतीले तूफान भी उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और रखरखाव की लागत बढ़ा सकते हैं. 

यह भी पढ़ेंः क्या चीन रोक सकता है ब्रह्मपुत्र का पानी, जानें क्या कहता है कानून?

बिजली को हजारों किलोमीटर का सफर तय करना होगा 

उत्पादित बिजली का बड़ा हिस्सा उत्तरी अफ्रीका, यूरोप और शायद दूसरे क्षेत्र के आबादी वाले इलाकों तक पहुंचाना होगा. इसके लिए हजारों किलोमीटर तक फैले एक बड़े ट्रांसमिशन नेटवर्क की जरूरत होगी. हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन से नुकसान कम हो सकता है, लेकिन ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने और बनाए रखने के लिए काफी ज्यादा निवेश की जरूरत होगी.

यह भी पढ़ेंः क्यूबा पर अमेरिका ने कब से बैन लगा रखा है और क्यों, जानें क्या है इतिहास?

स्पर्श गोयल एबीपी लाइव के साथ कंटेंट राइटर के तौर पर जुड़े हुए हैं. वह जनरल नॉलेज बीट की जिम्मेदारी संभालते हैं. कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में उन्हें चार साल का अनुभव है. एबीपी से पहले वह डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद में करीब दो साल तक काम कर चुके हैं. उन्होंने नमस्कार भारत से अपने करियर की शुरुआत की थी. .

वह अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करके पाठकों के लिए जानकारी को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में पेश करते हैं. उन्होंने न्यूज राइटिंग के साथ-साथ स्क्रीनराइटिंग में भी अपनी पकड़ मजबूत की.

उन्होंने मां शाकुम्भरी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. इसके साथ उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन से स्क्रीनप्ले का डिप्लोमा भी हासिल किया है.

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