किस टेक्नोलॉजी पर बनी है क्रिस्टोफर नोलेन की ‘द ओडिसी’, जो दुनिया के सिर्फ 36 सिनेमाघरों में हुई फिट
क्रिस्टोफर नोलन की 'द ओडिसी' भारत के तमाम IMAX सिनेमाघरों में दिखाई तो जा रही है, लेकिन कंप्रेस करके. चलिए जानें कि ऐसा क्यों हो रहा है जिससे यह फिल्म ओरिजनल फॉर्मेट में नहीं रिलीज हो पा रही है.

हॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘द ओडिसी’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है और दर्शकों के बीच इसको लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है. मैट डेमन, टॉम हॉलैंड, जेंडाया और ऐनी हैथवे जैसे बड़े सितारों से सजी यह फिल्म सिनेमाई इतिहास में एक नया इतिहास लिख रही है. इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका वह अनोखा और एडवांस तकनीकी फॉर्मेट है, जिसे परदे पर उतारने में दशकों का वक्त लग गया. लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस तकनीक का असली जादू दुनिया के कुछ चुनिंदा थिएटर्स में ही देखा जा सकता है. चलिए जानें कि यह किस तकनीक पर बनी है.
किस तकनीक पर बनी है ‘द ओडिसी’?
क्रिस्टोफर नोलन की 'द ओडिसी' को 'IMAX 15-perf/70mm' नामक बेहद जटिल और एडवांस एनालॉग फिल्म तकनीक पर तैयार किया गया है. पूरी दुनिया के सिनेमाई इतिहास में यह ऐसी पहली फीचर फिल्म बन गी है, जिसे शुरू से अंत तक केवल और केवल 70 मिमी IMAX फिल्म कैमरों की मदद से शूट किया गया है. इससे पहले किसी भी डायरेक्टर ने पूरी फिल्म में इस तकनीक का शत प्रतिशत इस्तेमाल नहीं किया था. नोलन के इस साहसी और अनूठे विजन के कारण फिल्म का हर एक सीन विजुअल मास्टरपीस की तरह नजर आता है.
क्या है IMAX तकनीक की असल पहचान?
सामान्य सिनेमा हॉल की तुलना में IMAX तकनीक दर्शकों को एकदम वास्तविक और गहराई भरा अनुभव प्रदान करती है. इसमें काफी बड़े आकार की स्क्रीन, बेहद ताकतवर लेजर या फिल्म प्रोजेक्टर और उन्नत साउंड सिस्टम का इस्तेमाल होता है. यह तकनीक परदे पर बहुत ज्यादा चमक, बेजोड़ रिजॉल्यूशन और एक विस्तृत व्यूइंग एंगल देती है, जिससे दर्शकों को लगता है कि वे खुद फिल्म के सीन के बीच खड़े हैं. समय के साथ ज्यादातर थिएटर लेजर तकनीक पर शिफ्ट हो चुके हैं, ताकि दुनिया को फिल्में कम लागत में दिखाई जा सकें.
कैसे काम करता है 15/70mm का जादू?
IMAX 15/70 को इस तकनीक का सबसे प्रीमियम, शुद्ध और ओरिजिनल रूप माना जाता है. इसमें 70 मिलीमीटर चौड़ी एनालॉग फिल्म रील का इस्तेमाल होता है, जो कि कैमरे और प्रोजेक्टर में हॉरिजॉन्टल रूप से चलती है. इसके हर सिंगल फ्रेम में 15 परफोरेशन यानी छेद होते हैं, जिससे कैमरे में सामान्य से की गुना अधिक विजुअल डाटा और बारीकियां रिकॉर्ड होती हैं. यही कारण है कि जब इसे विशालकाय परदे पर दिखाया जाता है तो 1.43:1 आस्पेक्ट रेशियो में तस्वीर बेहद स्पष्ट, नेचुरल और बिल्कुल सजीव दिखाई देती है.
असली फिल्म कैमरों के समर्थक रहे हैं नोलन
निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन हमेशा से डिजिटल के बजाय असली फिल्म कैमरों के बहुत बड़े समर्थक रहे हैं. द डार्क नाइट, डनकर्क, टेनेट और ओपेनहाइमर में इस तकनीक का आंशिक इस्तेमाल करने वाले नोलन लंबे समय से पूरी फिल्म को IMAX में बनाना चाहते थे. शुरुआती समय में ये कैमरे अत्यधिक भारी और बहुत ज्यादा शोर करने वाले होते थे, जिससे कलाकारों के संवाद रिकॉर्ड करना मुमकिन नहीं था. नोलन की लगातार मांग पर इंजीनियरों ने वर्षों की मेहनत के बाद इन कैमरों को हल्का और शांत बनाया, जिससे इस फिल्म की शूटिंग संभव हो सकी.
क्यों गिने-चुने थिएटर्स में ही रिलीज हो सकी ‘द ओडिसी’?
दुनियाभर में IMAX के 2000 से ज्यादा थिएटर्स होने के बाद भी द ओडसी को उसके ओरिजिनल 15/70mm फॉर्मेट में दिखा पाने की क्षमता सिर्फ 36-41 सिनेमाघरों के पास ही है. असल में जब पूरी दुनिया डिजिटल तकनीक की तरफ बढ़ी, तो थिएटर्स ने पुराने भारी-भरकम फिल्म प्रोजेक्टर्स को कबाड़ समझकर हटा दिया. कंपनी ने पिछले 50 सालों से नए एनालॉग प्रोजेक्टर बनाए ही नहीं हैं. पुराने प्रोजेक्टर्स को ढूंढकर, उनकी मरम्मत करना और उन्हें चलाने के लिए एक्सपर्ट ऑपरेटर रखना बेहद खर्चीला काम है, इसलिए ये केवल अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों तक सीमित हैं.
भारत में ऐसा एक भी सिनेमाघर नहीं
भारत में 30 से भी ज्यादा व्यावसायिक IMAX थिएटर्स चल रहे हैं, लेकिन ये सभी पूरी तरह से डिजिटल या डिजिटल-लेजर प्रोजेक्शन पर आधारित हैं. देश में एक भी ऐसा सिनेमाघर नहीं है, जहां 15/70mm का ओरिजिनल फिल्म प्रोजेक्टर काम कर रहा हो. इसका मतलब यह है कि भारतीय सिनेमाघरों में द ओडिसी देखने पर विजुअल्स तो शानदार दिखेंगे, लेकिन दर्शक उसे पूरे 1.43:1 फ्रेम और असली एनालॉग टेक्सचर के अनुभव से वंचित रह जाएंगे, जिसे नोलन ने पूरी शिद्दत के साथ बड़े परदे के लिए रचा है.
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