क्या फॉर्म 6 में अपनी मर्जी से बदलाव नहीं कर सकता चुनाव आयोग, किसके पास ये पावर?
चुनाव आयोग द्वारा नियम बदले बिना फॉर्म 6 में नए सवाल जोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है. आइए जानें कि फॉर्म 6 में बदलाव आखिर कौन कर सकता है और क्या चुनाव आयोग को इसका अधिकार नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बिना तय कानूनी प्रक्रिया के बदलाव करने और मतदाता सूची संशोधन से जुड़े गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाया है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस मामले में चुनाव आयोग, केंद्र सरकार, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को औपचारिक नोटिस जारी करके जवाब मांगा है. अदालत इस बात की कानूनी पड़ताल करेगी कि क्या फॉर्म में किए गए बदलाव तय नियमों के तहत हुए थे या नहीं. हालांकि, कोर्ट ने इस चरण में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से निलंबित करने वाली अर्जी खारिज कर दी, लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग अपनी मर्जी से फॉर्म 6 में बदलाव नहीं कर सकता है?
क्या होता है फॉर्म 6 और यह क्यों जरूरी है?
देश में 18 साल की उम्र पूरी करने वाले नए मतदाताओं, भारतीय नागरिकता हासिल करने वाले लोगों या किसी कारणवश सूची से नाम कट जाने के बाद दोबारा नाम जुड़वाने वालों के लिए फॉर्म 6 का इस्तेमाल किया जाता है. नियमों के मुताबिक, इस फॉर्म के जरिए आवेदक अपने साथ रहने वाले परिजनों के नाम और उनके वोटर कार्ड EPIC नंबर की जानकारी देता है. किसी भी भारतीय नागरिक के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने और पहली बार अपना वोटिंग कार्ड बनवाने के लिए यह सबसे मुख्य और आधिकारिक दस्तावेज माना जाता है.
ऑनलाइन फॉर्म में अचानक क्या बदल गया?
जुलाई के दौरान यह बात सामने आई कि चुनाव आयोग के डिजिटल पोर्टल पर मौजूद फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में एक नया घोषणा-पत्र जोड़ दिया गया था. इसमें विशेष गहन पुनरीक्षण SIR से जुड़े तीन नए सवाल पूछे गए थे. पहला सवाल यह था कि क्या आवेदक का नाम साल 2000 के शुरुआती दौर वाले एसआईआर में था, दूसरा सवाल माता-पिता या दादा-दादी के नाम की मौजूदगी को लेकर था और तीसरा सवाल दोनों में से किसी का भी नाम न होने से संबंधित था. यदि पहला विकल्प चुना जाता, तो पुरानी विधानसभा, पार्ट नंबर और क्रमिक संख्या की पूरी जानकारी देना जरूरी कर दिया गया था.
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वेबसाइट और पोर्टल के फॉर्म में दिखा बड़ा अंतर
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात यह देखने को मिली कि जो बदलाव चुनाव आयोग के पोर्टल के फॉर्म में किए गए थे, वे चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट से डाउनलोड होने वाले सामान्य पीडीएफ फॉर्म में थे ही नहीं. यानी जो नागरिक सीधे वेबसाइट से फॉर्म डाउनलोड कर रहे थे, उन्हें पुराने प्रारूप में ही आवेदन की सुविधा मिल रही थी, जबकि पोर्टल के जरिए ऑनलाइन आवेदन करने वाले लोगों को एसआईआर से जुड़ी यह नई और जटिल शर्तें पूरी करनी पड़ रही थीं. इसी असमानता ने पूरे विवाद को जन्म दिया.
फॉर्म 6 में कौन कर सकता है बदलाव?
भारत के जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और पंजीकरण निर्वाचन नियम 1960 के तहत फॉर्म 6 का ढांचा तय होता है. कानून के मुताबिक, चुनाव आयोग को अपनी मर्जी से किसी भी फॉर्म या उसके सवालों में फेरबदल करने का सीधा अधिकार नहीं है. इसके लिए विधि एवं न्याय मंत्रालय यानी केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक राजपत्र गजट में बाकायदा अधिसूचना जारी करनी पड़ती है. संसद और कानून मंत्रालय की मंजूरी के बिना किया गया कोई भी बदलाव वैधानिक रूप से अमान्य माना जाता है.
आयोग के भीतर से ही उठी विरोध की आवाज
जांच रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि आयोग के अपने ही शीर्ष अधिकारियों ने इस तरीके पर गहरी आपत्ति जताई थी. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग 10 महीनों के दौरान कई ऐसे फैसलों पर अपनी असहमति दर्ज कराई, जो उनके संज्ञान में लाए बिना लागू किए जा रहे थे. अगस्त के महीने में संधू ने इस बदलाव को पूरी तरह गैर-कानूनी और अनधिकृत करार देते हुए इसे तुरंत हटाने के निर्देश भी दिए थे. उनका कहना था कि जब तक केंद्र सरकार से औपचारिक संशोधन नहीं होता, तब तक ऐसा बदलाव लागू नहीं किया जा सकता.

विवाद बढ़ने पर चुनाव आयोग ने क्या कहा?
सितंबर के अंत में चुनाव आयोग ने सफाई जारी करते हुए बताया कि जिन राज्यों में एसआईआर का काम पूरा हो चुका है, वहां से ऑनलाइन पोर्टल वाले फॉर्म से इस अतिरिक्त घोषणा को हटा दिया गया है. आयोग का कहना था कि सामान्य दिनों में नियम 1960 के तहत पुराना मानक फॉर्म ही इस्तेमाल में लाया जाएगा. हालांकि, आयोग ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में यह स्पष्ट नहीं किया कि जुलाई में यह बदलाव किसने और किस अधिकार से जोड़ा था, और न ही आंतरिक आपत्तियों के बावजूद इसे लंबे समय तक जारी रखने की वजह बताई. अब मामला पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. अदालत यह तय करेगी कि क्या चुनाव आयोग ने प्रशासनिक अधिकारों की सीमा लांघकर कानून का उल्लंघन किया या यह महज एक तकनीकी प्रक्रिया थी.
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