Raghav Chadha Z Security: कैसे मिलती है Z सिक्योरिटी, इसके लिए कितना पैसा करना होता है खर्च?
Raghav Chadha Z Security: आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा की सुरक्षा को लेकर मचे घमासान के बीच 'Z श्रेणी' की सुरक्षा चर्चा में है. आइए जानें इस सुरक्षा के लिए आखिर कितने रुपये खर्चा करने होते हैं.

- निजी व्यक्तियों को सुरक्षा का पूरा खर्च स्वयं वहन करना पड़ता है.
Raghav Chadha Z Security: राजनीतिक गलियारों में इन दिनों राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को मिलने वाली सुरक्षा को लेकर बड़ी हलचल है. पंजाब सरकार द्वारा उनकी 'Z+' सुरक्षा हटाए जाने के बाद अब केंद्र सरकार द्वारा उन्हें 'Z श्रेणी' का कवर देने की खबरें आ रही हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर यह 'Z सुरक्षा' होती क्या है? किसी व्यक्ति को यह सुरक्षा कैसे आवंटित की जाती है और इस पर होने वाले भारी-भरकम खर्च कितना होता है और इसका बोझ किसकी जेब पर पड़ता है? आइए, सुरक्षा की इस अभेद्य दीवार के पीछे का पूरा गणित विस्तार से समझते हैं.
क्या है Z श्रेणी की सुरक्षा का कवच?
भारत में सुरक्षा व्यवस्था को कई श्रेणियों में बांटा गया है, जिनमें 'Z' श्रेणी को दूसरा सबसे मजबूत सुरक्षा घेरा माना जाता है. इस सुरक्षा कवर के तहत संबंधित व्यक्ति की सुरक्षा में कुल 22 जवान तैनात रहते हैं. इन जवानों में दिल्ली पुलिस, आईटीबीपी (ITBP) या सीआरपीएफ (CRPF) के सशस्त्र जवान शामिल होते हैं. सुरक्षा को और पुख्ता बनाने के लिए इसमें 4 से 5 नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) कमांडो भी तैनात किए जा सकते हैं. इस घेरे में तैनात कमांडो सातों दिन और 24 घंटे व्यक्ति की सुरक्षा की निगरानी करते हैं.
सुरक्षा का अभेद्य घेरा और आधुनिक हथियार से लैस कमांडो
Z श्रेणी की सुरक्षा पाने वाले व्यक्ति को न केवल जवानों का पहरा मिलता है, बल्कि उन्हें एक एस्कॉर्ट कार भी मुहैया कराई जाती है. इसमें शामिल सुरक्षाकर्मी आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं. कमांडो को मार्शल आर्ट्स और बिना हथियारों के लड़ने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है. इस श्रेणी से ऊपर 'Z+' सुरक्षा होती है, जिसमें 55 जवान तैनात होते हैं. राघव चड्ढा के मामले में चर्चा है कि उन्हें दिल्ली और पंजाब में Z सुरक्षा दी जा सकती है, जबकि अन्य राज्यों के लिए 'Y प्लस' श्रेणी का कवर रहेगा.
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कैसे तय होती है सुरक्षा की जरूरत?
भारत में किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा देना या न देना पूरी तरह से 'खतरे के आकलन' पर निर्भर करता है. इसके लिए खुफिया ब्यूरो (IB) और संबंधित राज्यों की खुफिया एजेंसियां अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंपती हैं. अगर रिपोर्ट में यह पुष्टि होती है कि किसी व्यक्ति की जान को आतंकवादियों, कट्टरपंथियों या किसी अन्य स्रोत से गंभीर खतरा है, तभी उसे सुरक्षा प्रदान की जाती है. यह प्रक्रिया काफी लंबी और गोपनीय होती है, जिसमें समय-समय पर सुरक्षा की समीक्षा भी की जाती है.
कितने पैसे करने होते हैं खर्चा?
हैरान करने वाली बात यह है कि अगर कोई उद्योगपति या निजी व्यक्ति सरकार से इस तरह की सुरक्षा की मांग करता है, तो उसका पूरा खर्च उसे खुद उठाना पड़ता है. आंकड़ों के मुताबिक, भारत में Z श्रेणी की सुरक्षा का मासिक खर्च लगभग 15 से 20 लाख रुपये के बीच होता है. वहीं, Z+ सुरक्षा के लिए यह आंकड़ा 40 से 50 लाख रुपये प्रति माह तक पहुंच सकता है. इसमें तैनात 22 से 55 जवानों के वेतन से लेकर हथियारों और वाहनों तक का पूरा बिल संबंधित व्यक्ति को भुगतान करना होता है.
किसकी जेब पर पड़ता है सुरक्षा का खर्च?
वीआईपी सुरक्षा एक अत्यंत खर्चीली व्यवस्था है. इसमें तैनात जवानों का वेतन, उनके रहने-खाने का इंतजाम और सुरक्षा वाहनों का ईंधन काफी महंगा पड़ता है. नियमानुसार, संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों, मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों की सुरक्षा का खर्च सरकार खुद उठाती है. यह पैसा आम तौर पर उस राज्य सरकार के बजट से जाता है जहां वह व्यक्ति निवास करता है. केंद्र सरकार की ओर से दी जाने वाली सुरक्षा का खर्च केंद्रीय गृह मंत्रालय वहन करता है, लेकिन इसके पीछे जनता के टैक्स का पैसा ही खर्च होता है.
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