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आयरन लेडी ऑफ असम, पढ़ें IPS संजुक्ता पराशर की कहानी, जिसने हिम्मत से बदल दी सोच

आयरन लेडी के नाम से मशहूर IPS संजुक्ता पराशर ने अपने साहस, ईमानदारी और देशभक्ति से लाखों युवाओं के दिलों में जगह बनाई. UPSC में टॉप रैंक लाने के बाद आईपीएस बनकर समाज की सुरक्षा को अपना मिशन बना लिया.

हर साल लाखों युवा यूपीएससी परीक्षा पास कर आईएएस या आईपीएस बनने का सपना देखते हैं. लेकिन उनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो अपने साहस और समर्पण से आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन जाते हैं. ऐसी ही एक नाम है IPS संजुक्ता पराशर, जो आज पूरे देश में “आयरन लेडी ऑफ असम” के नाम से जानी जाती हैं. उनकी कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला की है जिसने हर मुश्किल रास्ते को अपनी ताकत बना लिया.

संजुक्ता का जन्म और पालन-पोषण असम में हुआ. बचपन से ही वह पढ़ाई में अव्वल रहीं और हमेशा अपने माता-पिता का गर्व बनीं. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई असम में पूरी की और फिर दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया. यहीं से समाज को समझने और कुछ बड़ा करने की इच्छा उनके मन में और गहरी होती चली गई. इसके बाद उन्होंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में दाखिला लिया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की.

आसान नहीं था सफर

यहीं से उनके जीवन ने नया मोड़ लिया. उन्होंने UPSC परीक्षा की तैयारी शुरू की. यह रास्ता आसान नहीं था दिन-रात की मेहनत, असफलताओं का डर और समाज की उम्मीदें सबकुछ एक साथ झेलना पड़ा. लेकिन संजुक्ता ने कभी हार नहीं मानी. आखिरकार साल 2006 में उन्होंने UPSC परीक्षा पास की और ऑल इंडिया रैंक 85 हासिल की. यह एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने IAS नहीं, बल्कि Indian Police Service (IPS) को चुना.

जब हर कोई आरामदायक प्रशासनिक नौकरी की ओर बढ़ना चाहता है, संजुक्ता ने कठिन रास्ता चुना कानून, अपराध और जनता की सुरक्षा का. उन्होंने असम-मेघालय कैडर चुना, यानी वही इलाका जहां आतंकवाद, हिंसा और उथल-पुथल का माहौल रहता था. लेकिन उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

चुनौतियों का सामना

IPS बनने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग असम के मकुम में सहायक कमांडेंट के रूप में हुई. यहां उन्हें बेहद चुनौतीपूर्ण माहौल का सामना करना पड़ा. लेकिन संजुक्ता ने अपनी बहादुरी और निडरता से सबका दिल जीत लिया. जब उदालगुरी जिले में बोडो और बांग्लादेशी समुदाय के बीच हिंसा भड़की, तब उन्हें वहां भेजा गया. उन्होंने बिना किसी डर के हालात को संभाला और हिंसा पर नियंत्रण पाया. उस वक्त से असम में लोग उन्हें “आयरन लेडी” कहने लगे.

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