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सत्ता का सेज और विचारों की विरासत की टूटी खाट के बीच खड़ी पार्टियां

भारत के इतिहास में सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता लोगों के संगठित आंदोलनों के बीच से निकलता है. 1947 में भारत के लोगों के संगठित आंदोलनों ने ब्रिटिश सत्ता को बेदखल किया. इसके बाद कॉग्रेस के नेतृत्व के खिलाफ पूरे देश में  सत्ता से बेदखली के लिए आंदोलनों के नतीजे 1967 में सामने आए. नौ राज्यों में संविद सरकारें बनी. इसी क्रम में तमिलनाडु के समाज में भी एक निर्णायक राजनीतिक मोड़ आया जब ऐतहासिक द्रविड़ आंदोलन की विरासत की जमीन पर तैयार नेताओं ने सत्ता अपने हाथों में ली. द्रमुक के नेता अन्नादुराई ने 1949 में द्रविण महासंघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आया था. 1972 में फिर द्रमुक में विभाजन हो गया और लोकप्रिय फिल्म स्टार एम के रामचंद्रन ने अन्नाद्रमुक का गठन किया.

फिल्म के जरिये लोकप्रिय होने वाले एम करुणानिधि के नेत़ृत्व में एक तरफ डीएमके और दूसरी तरफ रामचंद्रन के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक के बीच संसदीय सत्ता सिमट गई. लेकिन 2026 में 234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधानसभा   में दोनों ही द्रविण पार्टियां सत्ता के आपसी खेल से बाहर हो गई.1980 के बाद संसदीय राजनीति के चरित्र में एक बड़ा बदलाव आने के संकेत मिलने लगे. एक बड़ा बदलाव यह आया कि पार्टियां व्यक्ति केन्द्रित हो गई.

परिवारवाद से निकल रही संसदीय राजनीति

संसदीय राजनीति में पार्टियों का नेतृत्व परिवार से निकलने लगा. तमिलनाडु में भी द्रमुक परिवार में सिमटती गई. एम करूणानिधि ने पुत्र एम के स्टालीन को सत्ता सौप दी. लेकिन देश में जिस तरह की राजनीतिक संस्कृति विकसित हो रही थी, उसका यह एक उदाहरण भर था. पूरे देश में पार्टियों के जिस नेतृत्व के परिवार थे उन्होने परिवार को अपना राजनीतिक विरासत सौपने के इर्द गिर्द सत्ता समीकरण बनाने पर जोर लगा दिया. जिस नेतृत्व के परिवार की अगली पीढ़ी नहीं थी, उनका संकट ज्यादा गहरा हो गया. तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक उनमे एक है. एम जी रामचंन्द्रन की विरासत उनकी एक अभिन्न मित्र और फिल्म स्टार के रुप में सहयोगी जयललिता के पास आ गई. जयललिता भी शादी शुदा नहीं थी.लिहाजा परिवार को राजनीतिक विरासत सौपने का एक संकट यहां मौजूद रहा  और यह पार्टी व्यक्तियों के महत्वकांक्षाओं के दबाव में बिखरती रही.

आंदोलनों का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन में निहित होता है. यानी एक सामूहिक चेतना का निर्माण आंदोलन करती है. सामूहिक चेतना का मतलब इस तरह की सोच कि मिल जूलकर किस तरह का समाज तैयार करना है. जिस तरह के लोग मिलते जुलते है और अपने तरीके का समाज बनाने के लिए संगठित होते हैं, उस विचार को  वामपंथ, दक्षिण पंथ व अन्य रुपों में परिभाषित किया जाता है.    

सामूहिक चेतना के आधार पर बने संगठन, सत्ता और सत्ता को चलाने वाले पर दबाव बनाते है. लेकिन सत्ता का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन में निहित नहीं होता है बल्कि अपने वजूद के पक्ष में सामाजिक समीकरणों और स्थितियों को संतुलित करना होता है. वह संसाधनों के मामले में ज्यादा संगठित-शक्तिशाली तो होती ही है. उसकी बनाई गई संस्थाएं उनके बीच भी जिंदा रहती है जो कि किसी आंदोलनो से नये समाज का निर्माण करने के लिए आगे बढ़ती है.    

आंदोलनों के जरिए आ रहे बदलाव

संसदीय राजनीति में 1980 के बाद से आंदोलनों के जरिये सामाजिक बदलाव के विचार पर जोर देने की सोच कम से कम हो गई और सत्ता को ही समाज में सुधार के मुख्य औजार के रुप में देखने और उसे इस्तेमाल करने की संस्कृति विकसित हो गई. नई आर्थिक नीतियों ने सत्ता को विनियोग के एक सहयोगी उद्योग के रुप में भी विकसित कर लिया. राजनीतिक पार्टियों का जोर सत्ता के लिए समीकरणों पर ज्यादा रहा. इसका उदाहरण तमिलानाडु में सामाजिक न्याय के आंदोलन की विरासत पर द्रमुक पार्टियां बनी लेकिन उनका सत्ता समीकरण उनके साथ भी समय समय पर हुआ जो कि सामाजिक न्याय की उस अवधारणा के खिलाफ थी जिस पर रामास्वामी पेरियार ने आंदोलन की जमीन तैयार की थी. 

इस तरह उन पार्टियों में तो एक दबाव बनाने की स्थिति रही जिसमे नेतृत्व की अवधारणा भले ही परिवारों तक सीमित हो गई हो लेकिन उस नेतृत्व ने किसी वर्ग, जाति –समीकरणों या जाति विशेष के समूहों के नेतृत्व के रुप में खुद को तैयार करने में फौरी कामयाबी हासिल कर ली. उदाहरण स्वरुप द्रमुक में 2026 के चुनाव नतीजों के बजाय विखराव नहीं हुआ लेकिन अम्मा द्रमुक में फिर से सत्ता के लिए  विभाजन की घटना देखने को मिली है.  इसकी मुख्य वजह यही है कि उसके नेतृत्व के पास पारिवारिक विरासत भी नहीं है और ना ही कोई ‘ लोकप्रियता ’ का ब्रांड. भले ही वह अपने आपको को समाजवादी और धर्म निरपेक्षता की  विचारधारा का वाहक होने का दावा करती हो लेकिन वह उसकी सुविधा का हिस्सा ज्यादा है. विरासत की टूटी फूटी खाट पर उसका जीवन आश्रित है. जब कभी राज्य के राजनीतिक हालात ऐसे बन जाते हैं जिसमे उन्हें चुनावी गणित में नंबर हासिल करने की गुंजाइश होती है. वे अपनी राजनीतिक विरासत की सक्रियता के आधार पर संगठित करने के प्रयासों के नतीजे नहीं माने जा सकते हैं.

संसदीय पार्टियों में नेतृत्व क्षमता सत्ता के नेतृत्व की क्षमताओं के आगे कभी भी अपने असली रुप में सामने आ जाती है जब सत्ता को उसे चुनौती देने की जरुरत महसूस हो. तमिलनाडु भी उसका एक उदाहरण है लेकिन यह कोई नई राजनीतिक प्रवृति नहीं है. राजनीतिक परिवार हो लेकिन पैसा, और प्रचार का प्रभाव नहीं हो तो ससंदीय राजनीति में  सांगठनिक ढांचे को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है. लेकिन राजनीतिक नेतृत्व वाले परिवार में परिवारों के लिए पदों के लिए स्रोत और उसकी स्वीकार्यता  नहीं हो तो वहां भारतीय घरों की तरह विभाजन की संस्कृति प्रभावी होती है. अन्नाद्रमुक के पास न परिवार है और ना ही पदों का प्रभाव. वैचारिक विरासत भी कई तरह की दरारें दिखती है. ऐसै में सत्ता का सेज आकर्षित करता है तो हैरानी नहीं. ना ही इसे किसी राजनीतिक नैतिकता से नापा जा सकता है. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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