एक्सप्लोरर

opinion: हरित भारत चाहिए, लेकिन क्या सिर्फ इलेक्ट्रिक गाड़ियां ही रास्ता हैं?

दिल्ली सरकार की प्रस्तावित “सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन (EV)” नीति सुनने में बहुत आकर्षक लगती है. साफ हवा, कम प्रदूषण और पर्यावरण की रक्षा- इन उद्देश्यों से कोई भी असहमत नहीं हो सकता, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी एक तकनीक को ही भविष्य घोषित कर देना सही होगा? क्या प्रदूषण कम करने का मतलब केवल बैटरी वाली गाड़ियां ही रह गया है? या फिर सरकार का काम यह तय करना होना चाहिए कि प्रदूषण कितना कम हो, न कि यह कि लोग कौन-सी तकनीक अपनाएं? यही वह सवाल है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. 

अगर सरकार एक ही तकनीक को बढ़ावा देगी और बाकी विकल्पों को लगभग खत्म कर देगी, तो यह प्रतिस्पर्धा, नवाचार और उपभोक्ता की पसंद- तीनों पर असर डालेगा. भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में एक ही समाधान सभी लोगों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता. भारत की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से उसकी विविधता रही है. यही बात परिवहन व्यवस्था पर भी लागू होती है.

आज बाजार में पेट्रोल की आधुनिक और कम प्रदूषण वाली गाड़ियां हैं, हाइब्रिड वाहन हैं, सीएनजी है, बायोफ्यूल है, फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक है, हाइड्रोजन पर काम चल रहा है और इलेक्ट्रिक वाहन भी हैं. दुनिया की लगभग सभी बड़ी ऑटो कंपनियां इन सभी तकनीकों पर एक साथ निवेश कर रही हैं. इसका मतलब साफ है कि अभी किसी एक तकनीक को अंतिम समाधान नहीं माना गया है. ऐसे में यदि सरकार पहले से ही केवल बैटरी वाली गाड़ियों को विजेता घोषित कर दे, तो यह तकनीकी विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया को रोक सकता है.

इतिहास बताता है कि जब सरकारें किसी एक तकनीक या उद्योग के साथ जरूरत से ज्यादा जुड़ जाती हैं, तब नीति संबंधी गलतियां महंगी साबित होती हैं. सबसे बड़ा सवाल आम आदमी की जेब का है. आज भी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की कीमत देश के करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों, छोटे व्यापारियों, टैक्सी चालकों, ऑटो चालकों और डिलीवरी करने वाले युवाओं की पहुंच से बाहर है. केवल गाड़ी खरीदना ही चुनौती नहीं है, बल्कि कुछ वर्षों बाद बैटरी बदलने का खर्च भी लाखों रुपये तक पहुंच सकता है. इसके अलावा सेकेंड हैंड बाजार में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की कीमत को लेकर भी अभी भरोसा नहीं बन पाया है. ऐसे में अगर लोगों के सामने विकल्प ही खत्म कर दिए जाएं, तो उन्हें मजबूरी में महंगी तकनीक अपनानी पड़ेगी. इसका सीधा असर परिवारों की बचत, छोटे कारोबारों की लागत और रोजमर्रा के परिवहन खर्च पर पड़ेगा.

एक और महत्वपूर्ण पहलू विदेशी निर्भरता का है. आज भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है और यह सही है कि इससे विदेशी मुद्रा खर्च होती है. लेकिन यदि पूरे देश को तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर धकेला गया, तो भारत को लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, बैटरी सेल और दूसरी महत्वपूर्ण सामग्री भी बड़े पैमाने पर विदेशों से आयात करनी पड़ेगी. यानी कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी, लेकिन बैटरियों और महत्वपूर्ण खनिजों पर नई निर्भरता शुरू हो जाएगी. अनुमान बताते हैं कि यदि इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी तो बैटरी आयात का खर्च बहुत तेजी से बढ़ सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम एक विदेशी निर्भरता से निकलकर दूसरी विदेशी निर्भरता में फंसने की तैयारी तो नहीं कर रहे?

केवल गाड़ियां बदल देने से पर्यावरण की सभी समस्याएं खत्म नहीं हो जातीं. इलेक्ट्रिक वाहन सड़क पर धुआं नहीं छोड़ते, लेकिन उनकी बैटरी बनाने में भारी मात्रा में खनिज, पानी और ऊर्जा की जरूरत पड़ती है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि कुछ वर्षों बाद जब करोड़ों बैटरियां बेकार हो जाएंगी, तब उनका निपटान कैसे होगा? भारत के पास अभी बड़े पैमाने पर बैटरी रीसाइक्लिंग और सुरक्षित निस्तारण की पूरी व्यवस्था मौजूद नहीं है. अगर समय रहते इसकी तैयारी नहीं हुई, तो आज का समाधान कल एक नए इलेक्ट्रॉनिक कचरे के संकट में बदल सकता है.

इसके साथ ही बिजली उत्पादन की वास्तविकता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भारत में आज भी बिजली का बड़ा हिस्सा कोयले से बनता है. यदि चार्ज होने वाली बिजली ही कोयले से बनेगी तो कुल मिलाकर कार्बन उत्सर्जन में कमी उतनी नहीं होगी, जितनी दिखाई जाती है. इसलिए केवल वाहन बदलना पर्याप्त नहीं है. स्वच्छ बिजली उत्पादन, बेहतर ग्रिड और ऊर्जा संरचना भी उतनी ही जरूरी है. यदि इन क्षेत्रों में समान गति से सुधार नहीं हुआ तो इलेक्ट्रिक वाहन अपेक्षित पर्यावरणीय लाभ नहीं दे पाएंगे.

रोजगार का सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है. देशभर में लाखों लोग पारंपरिक ऑटोमोबाइल उद्योग से जुड़े हुए हैं. छोटे गैराज, मैकेनिक, स्पेयर पार्ट्स की दुकानें, पेट्रोल पंप, इंजन रिपेयरिंग, ऑटो पार्ट्स निर्माण और छोटे परिवहन व्यवसाय- इन सबकी आजीविका पारंपरिक वाहनों पर आधारित है. यदि अचानक नीति बदलकर केवल इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाता है तो लाखों लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है. नई तकनीक के साथ नए रोजगार जरूर आएंगे, लेकिन पुराने रोजगार खत्म होने से पहले लोगों को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और वैकल्पिक अवसर उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी होगी.

दिल्ली जैसी भीड़भाड़ वाली महानगरी में प्रदूषण कम करने के लिए केवल गाड़ियों की तकनीक बदलना ही पर्याप्त नहीं है. शहरों में सुरक्षित और बेहतर साइकिल ट्रैक बनाए जाएं, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए, मेट्रो और बस नेटवर्क का विस्तार हो, पैदल चलने वालों के लिए सुविधाएं बढ़ें और ट्रैफिक प्रबंधन सुधारा जाए. यदि छोटी दूरी के लिए लाखों लोग साइकिल या सार्वजनिक परिवहन अपनाएं, तो प्रदूषण भी कम होगा, विदेशी मुद्रा भी बचेगी और लोगों का स्वास्थ्य भी बेहतर होगा. यह समाधान अपेक्षाकृत सस्ता और अधिक प्रभावी हो सकता है.

भारत की इंजीनियरिंग क्षमता को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. देश ने दशकों तक आधुनिक पेट्रोल और डीजल इंजनों के विकास में बड़ी विशेषज्ञता हासिल की है. आज के आधुनिक पेट्रोल इंजन पहले की तुलना में कहीं अधिक स्वच्छ, कम ईंधन खर्च करने वाले और पर्यावरण के अनुकूल हैं. हाइब्रिड तकनीक भी ईंधन की खपत और प्रदूषण दोनों कम करती है. यदि इन सभी तकनीकों को केवल इसलिए किनारे कर दिया जाए कि एक नई तकनीक को आगे बढ़ाना है, तो यह देश की तकनीकी क्षमता और उद्योग दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

सरकार का उद्देश्य किसी एक तकनीक को विजेता घोषित करना नहीं होना चाहिए. उसका उद्देश्य केवल इतना होना चाहिए कि प्रदूषण कम हो, ऊर्जा सुरक्षित रहे, रोजगार बचे और उपभोक्ता को अपनी जरूरत और क्षमता के अनुसार विकल्प चुनने की आजादी मिले. यदि इलेक्ट्रिक वाहन वास्तव में सबसे बेहतर और किफायती विकल्प साबित होंगे तो लोग उन्हें स्वाभाविक रूप से अपनाएंगे, लेकिन यदि किसी नीति के जरिए लोगों पर केवल एक विकल्प थोपा जाएगा तो इससे बाजार भी प्रभावित होगा और उपभोक्ता भी.

हरित भारत की दिशा में आगे बढ़ना समय की जरूरत है, लेकिन हरित भविष्य का रास्ता केवल एक तकनीक से होकर नहीं गुजरता. भारत जैसे देश में समाधान संतुलित, व्यावहारिक और तकनीक-तटस्थ होना चाहिए. स्वच्छ परिवहन का लक्ष्य जरूरी है, लेकिन उसके लिए प्रतिस्पर्धा, नवाचार और उपभोक्ता की पसंद को खत्म करना सही रास्ता नहीं होगा. आखिरकार, सरकार का काम यह तय करना नहीं है कि लोग कौन-सी गाड़ी खरीदें, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर तकनीक प्रदूषण कम करे, सुरक्षित हो और देश के आर्थिक हितों के अनुरूप हो. साफ हवा जरूर चाहिए, लेकिन उसके लिए विकल्पों के दरवाजे बंद नहीं, बल्कि खुले रहने चाहिए.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

View More

ओपिनियन

Sponsored Links by Taboola
25°C
New Delhi
Rain: 100mm
Humidity: 97%
Wind: WNW 47km/h

टॉप हेडलाइंस

शशि थरूर को पसंद नहीं आई रणवीर सिंह की धुरंधर? देखकर बोले- 'घिनौने सीन...'
शशि थरूर को पसंद नहीं आई रणवीर सिंह की धुरंधर? देखकर बोले- 'घिनौने सीन...'
फडणवीस कैबिनेट में बिश्नोई गैंग शामिल? संजय राउत बोले- 'एकनाथ शिंदे को CM नहीं बनाया तो...'
फडणवीस कैबिनेट में बिश्नोई गैंग शामिल? संजय राउत बोले- 'एकनाथ शिंदे को CM नहीं बनाया तो...'
मंदिर पहुंचे बांग्लादेश के PM तारिक रहमान, 10 लाख का दिया दान, बोले- 'सभी धर्मों...'
मंदिर पहुंचे बांग्लादेश के PM तारिक रहमान, 10 लाख का दिया दान, बोले- 'सभी धर्मों...'
ICC की ताजा रैंकिंग में शाई होप को जबरदस्त फायदा, भारत के खिलाफ जड़े थे 2 शतक
ICC की ताजा रैंकिंग में शाई होप को जबरदस्त फायदा, भारत के खिलाफ जड़े थे 2 शतक

वीडियोज

Sansani : साजिश की श्रद्धा....खेल खत्म ! | ABP
Ravana Dahan 2026 : विजयादशमी की धूम..देशभर में जश्न | Vijayadashami | Delhi | Ramlila Maidan
Janhit with Chitra Tripathi: फ्रांस की तरह भारत में भी 'आगजनी' की साजिश थी? | Rahul Gandhi | GenZ
Bharat ki Baat | UP Politics: राम के नाम से 2027 में किसकी 'विजय'? | UP News | Breaking | Akhilesh
Sandeep Chaudhary: यूरोप में विरोध का मंजर...भागवत को काहे का डर? | Delhi | Rahul Gandhi | Protest

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
शशि थरूर को पसंद नहीं आई रणवीर सिंह की धुरंधर? देखकर बोले- 'घिनौने सीन...'
शशि थरूर को पसंद नहीं आई रणवीर सिंह की धुरंधर? देखकर बोले- 'घिनौने सीन...'
फडणवीस कैबिनेट में बिश्नोई गैंग शामिल? संजय राउत बोले- 'एकनाथ शिंदे को CM नहीं बनाया तो...'
फडणवीस कैबिनेट में बिश्नोई गैंग शामिल? संजय राउत बोले- 'एकनाथ शिंदे को CM नहीं बनाया तो...'
मंदिर पहुंचे बांग्लादेश के PM तारिक रहमान, 10 लाख का दिया दान, बोले- 'सभी धर्मों...'
मंदिर पहुंचे बांग्लादेश के PM तारिक रहमान, 10 लाख का दिया दान, बोले- 'सभी धर्मों...'
ICC की ताजा रैंकिंग में शाई होप को जबरदस्त फायदा, भारत के खिलाफ जड़े थे 2 शतक
ICC की ताजा रैंकिंग में शाई होप को जबरदस्त फायदा, भारत के खिलाफ जड़े थे 2 शतक
कौन हैं कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, जिन्होंने भरे मंच पर दलेर मेहंदी को लताड़ा?
कौन हैं कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, जिन्होंने भरे मंच पर दलेर मेहंदी को लताड़ा?
'महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हम, PM मोदी...', खरगे ने प्रधानमंत्री से क्या कहा?
'महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हम, PM मोदी...', खरगे ने प्रधानमंत्री से क्या कहा?
'पहले उतना बूता...', CM योगी को चंद्रशेखर की चुनौती पर अपर्णा यादव का बयान
'पहले उतना बूता...', CM योगी को चंद्रशेखर की चुनौती पर अपर्णा यादव का बयान
हर साल इतने मोबाइल और टैब हो रहे खराब, लगातार आ रहीं शिकायतें
हर साल इतने मोबाइल और टैब हो रहे खराब, लगातार आ रहीं शिकायतें
Embed widget