WagonR या Fronx, किस मॉडल को फ्लेक्स फ्यूल तकनीक के साथ पेश करेगी Maruti? जानें डिटेल्स
Maruti Flex Fuel Car: कंपनी 4 जून को अपनी पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार पेश करने वाली है. कंपनी पहले भी इस मॉडल के प्रोटोटाइप को अलग-अलग शो में पेश कर चुकी है. आइए डिटेल्स जानते हैं.

भारत में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच कार निर्माता कंपनियां ऐसे ऑप्शन्स पर काम कर रही हैं, जिनसे ग्राहकों का फ्यूल खर्च कम हो सके. इलेक्ट्रिक और CNG गाड़ियों के बाद अब फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक चर्चा में है. इसी कड़ी में देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी एक बड़ा कदम उठाने जा रही है.
कंपनी 4 जून को अपनी पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार पेश करने वाली है. माना जा रहा है कि यह कार पॉपुलर हैचबैक वैगनआर पर बेस्ड हो सकती है. यह भारत की पहली बड़े पैमाने पर फ्लेक्स-फ्यूल पैसेंजर कार बन सकती है.
क्या होती है फ्लेक्स फ्यूल तकनीक?
फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक ऐसी होती है जिसमें गाड़ी सिर्फ पेट्रोल ही नहीं, बल्कि एथेनॉल मिक्स फ्यूल पर भी चल सकती है. सामान्य पेट्रोल कारें अभी E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिक्स पेट्रोल तक इस्तेमाल कर सकती हैं, जबकि फ्लेक्स-फ्यूल कारें E85 या E100 जैसे एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर भी चलने में सक्षम होती हैं. E100 का मतलब लगभग पूरी तरह एथेनॉल बेस्ड फ्यूल है.
कौन-सा मॉडल किया जाएगा लॉन्च?
मारुति सुजुकी ने अभी ऑफिशियली यह नहीं बताया है कि कौन-सा मॉडल लॉन्च किया जाएगा, लेकिन ऑटो सेक्टर की रिपोर्ट्स के मुताबिक वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल इस तकनीक के साथ आने वाली कंपनी की पहली कार हो सकती है. कंपनी पहले भी इस मॉडल के प्रोटोटाइप को अलग-अलग शो में पेश कर चुकी है. फ्रॉन्क्स फ्लेक्स-फ्यूल का नाम भी सामने आया है, लेकिन वैगनआर को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है.
इस नई तकनीक के लिए कार के इंजन में कई बदलाव किए गए हैं. इसमें खास इंजन मैनेजमेंट सिस्टम, अपग्रेडेड फ्यूल पंप, नए इंजेक्टर और एथेनॉल की मात्रा पहचानने वाले सेंसर लगाए गए हैं. इसके अलावा कोल्ड स्टार्ट के दौरान बेहतर प्रदर्शन के लिए विशेष तकनीक भी दी गई है. इन बदलावों की मदद से कार अलग-अलग एथेनॉल मिक्स फ्यूल पर आसानी से चल सकेगी.
विदेशों से इम्पोर्ट करता है कच्चा तेल
फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को बढ़ावा देने के पीछे सरकार का भी बड़ा उद्देश्य है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से इम्पोर्ट करता है, जिस पर हर साल भारी विदेशी करेंसी खर्च होती है. अगर इस फ्यूल का इस्तेमाल बढ़ता है तो तेल आयात पर निर्भरता कम हो सकती है. इसके साथ ही गन्ने और दूसरे कृषि उत्पादों से बनने वाले एथेनॉल की मांग बढ़ने पर किसानों को भी फायदा मिल सकता है.
इस तकनीक के सामने एक बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर की है. फिलहाल देशभर में E85 और E100 फ्यूल आसानी से मौजूद नहीं है. इसी वजह से लॉन्च के तुरंत बाद कार की बिक्री बड़े लेवल पर शुरू होने की उम्मीद कम बताई जा रही है. सरकार और तेल कंपनियां आने वाले सालों में हजारों एथेनॉल फ्यूल स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम कर रही हैं, जिससे फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों का इस्तेमाल आसान हो सके.
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Source: IOCL

























