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मानसून से पहले मूंगफली की बुवाई की करें तैयारी, एक्सपर्ट्स के इन टिप्स का रखें ध्यान

Peanuts Farming Tips: मानसून के साथ मूंगफली की बुवाई का सही समय शुरू हो गया है और एक्सपर्ट्स के बताए गए तरीकों को अपनाकर किसान रिकॉर्ड पैदावार ले सकते हैं.

Peanuts Farming Tips: मानसून की आहट के साथ ही मूंगफली की खेती करने वाले किसान भाइयों के लिए सबसे जरूरी समय शुरू हो गया है. मूंगफली एक ऐसी फसल है जो कम पानी और सही मैनेजमेंट के साथ आपको मालामाल कर सकती है. लेकिन अच्छी पैदावार के लिए सिर्फ बीज बो देना काफी नहीं है.

बल्कि एक्सपर्ट्स के बताए गए सही समय और सही तरीके का तालमेल बिठाना बहुत जरूरी है. अगर आप मानसून की पहली बारिश के साथ अपनी प्लानिंग सटीक रखते हैं, तो फसल की क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों ही हैरान कर देने वाली होगी. इन तरीकों को अपनाकर ही आप बाजार में अपनी फसल का बेहतर दाम हासिल कर सकते हैं.

सही समय पर बुवाई जरूरी

मूंगफली की अच्छी फसल के लिए सबसे पहली शर्त है बुवाई का सही वक्त और बीजों का सही चुनाव. एक्सपर्ट्स की मानें तो जून का महीना इसके लिए सबसे परफेक्ट होता है. क्योंकि इस समय मिट्टी का तापमान और नमी अंकुरण के लिए एकदम सटीक होती है. बुवाई से पहले बीजों का उपचार यानी सीड ट्रीटमेंट करना बिल्कुल न भूलें.

यह फसल को शुरुआती बीमारियों और मिट्टी से पैदा होने वाले फंगस से बचाता है. हमेशा ऐसी वैरायटी चुनें जो आपके इलाके की मिट्टी और जलवायु के हिसाब से सही हो. उन्नत किस्म के बीज न केवल तेजी से बढ़ते हैं. बल्कि उनमें तेल की मात्रा भी ज्यादा निकलती है.

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ऐसे करें मिट्टी की तैयारी 

मूंगफली की खेती के लिए भुरभुरी और रेतीली दोमट मिट्टी सबसे बेहतरीन मानी जाती है क्योंकि इसमें फलियां जमीन के अंदर आसानी से फैल पाती हैं. खेत की तैयारी के समय गहरी जुताई करें और मिट्टी की जांच के आधार पर ही खाद का इस्तेमाल करें. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि मूंगफली की फसल में जिप्सम का उपयोग बहुत जरूरी है.

यह फलियों के दानों को ठोस और चमकदार बनाता है. जरूरत से ज्यादा यूरिया के बजाय फास्फोरस और पोटाश के सही अनुपात पर ध्यान दें. इस बात का ध्यान रखें अगर मिट्टी की बनावट सही होगी तो जड़ों में गांठे अच्छी बनेंगी जिससे पैदावार में सीधा इजाफा देखने को मिलेगा.

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इन बातों का रखें खास ध्यान

फसल की शुरुआती स्टेज में खरपतवार यानी घास-फूस को कंट्रोल करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. क्योंकि ये फसल का न्यूट्रिशन चुरा लेते हैं. बुवाई के 20 से 30 दिनों के भीतर निराई-गुड़ाई जरूर करें लेकिन ध्यान रहे कि जब पौधों में फूल आने लगें और सुइयां जमीन में जाने लगें तब छेड़छाड़ न करें.

सिंचाई के मामले में मानसून की बारिश पर नजर रखें लेकिन अगर बारिश में देरी हो तो हल्की सिंचाई का इंतजाम रखें. मार्डन ड्रिप या स्प्रिंकलर सिस्टम का इस्तेमाल करके आप न केवल पानी बचा सकते हैं. बल्कि पौधों की जड़ों तक नमी का सही लेवल भी मेंटेन कर सकते हैं. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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