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कब और किसने लागू किया था एमएसपी सिस्टम? इससे पहले कैसे होती थी फसलों की खरीद

MSP For Farmers: भारत में एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की शुरुआत कब हुई. इससे पहले फसल की कीमतें किस तरह मिलती है. जान लीजिए इस बारे में पूरी जानकारी.

MSP For Farmers: भारत में खेती-किसानी की जब भी बात होती है. एमएसपी यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस का जिक्र सबसे पहले आता है. यह सिस्टम किसानों के लिए एक सेफ्टी नेट की तरह काम करता है ताकि मार्केट में कीमतों के गिरने पर उन्हें भारी नुकसान न उठाना पड़े. एमएसपी की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी जब भारत अनाज की भारी किल्लत से जूझ रहा था.

और लाल बहादुर शास्त्री सरकार ने देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया था. उस दौर में हरित क्रांति की नींव रखी जा रही थी और किसानों को नई तकनीकों और बीजों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए एक सुनिश्चित आय का भरोसा देना बेहद जरूरी था. जान लीजिए एमएसपी की पूरी कहानी. 

कब हुई थी एमएसपी की शुरुआत?

एमएसपी सिस्टम को औपचारिक रूप से साल 1966-67 में लागू किया गया था. इसकी शुरुआत के पीछे लक्ष्मीकांत झा की अध्यक्षता में बनी खाद्य अनाज मूल्य समिति का बड़ा हाथ था. सरकार ने महसूस किया कि अगर किसान को उसकी मेहनत का वाजिब दाम नहीं मिलेगा. तो वह ज्यादा उत्पादन के लिए प्रेरित नहीं होगा.

सबसे पहले गेहूं के लिए एमएसपी तय की गई थी जिससे किसानों को बिचौलियों के चंगुल से बचाया जा सके. इसके बाद धीरे-धीरे अन्य फसलों को भी इस दायरे में लाया गया. आज कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों पर सरकार हर साल रबी और खरीफ की फसलों के लिए एमएसपी का ऐलान करती है जिससे मार्केट में एक बैलेंस बना रहता है.

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एमएसपी से पहले फसलों की खरीद का तरीका

एमएसपी सिस्टम लागू होने से पहले किसानों की हालत काफी चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि फसलों की खरीद पूरी तरह से ओपन मार्केट और बड़े व्यापारियों पर निर्भर थी. उस समय कोई फिक्स रेट नहीं होता था और फसल कटने के बाद जब मंडियों में आवक बढ़ती थी, तो व्यापारी मिलीभगत करके कीमतें गिरा देते थे.

किसानों के पास अनाज को स्टोर करने की सुविधा नहीं होती थी. इसलिए उन्हें मजबूरी में अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती थी. उस दौर में साहूकारों और जमींदारों का दबदबा था और किसान अक्सर कर्ज के जाल में फंसे रहते थे क्योंकि फसल बेचने के बाद भी उनकी लागत तक वसूल नहीं हो पाती थी.

आधुनिक दौर में एमएसपी की अहमियत 

आज के समय में एमएसपी न केवल कीमतों को कंट्रोल करता है बल्कि देश की फूड सिक्योरिटी सुनिश्चित करने में भी बड़ी भूमिका निभाता है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) और अन्य सरकारी एजेंसियां एमएसपी पर अनाज खरीदकर उसका बफर स्टॉक बनाती हैं. जिसका इस्तेमाल पीडीएस यानी राशन सिस्टम के जरिए गरीबों तक अनाज पहुँचाने में होता है.

अब सरकार का फोकस एमएसपी को लागत का कम से कम डेढ़ गुना करने पर है. जिससे किसानों की आय में इजाफा हो सके. हालांकि आज भी फल, सब्जी और कई अन्य फसलों पर यह सिस्टम लागू नहीं है. लेकिन अनाज के मामले में इसने भारतीय खेती को एक मजबूत आधार प्रदान किया है जिससे किसान भविष्य की योजनाएं बेहतर बना पाते हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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