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मूंग की दाल की खेती में आजमाएं ये तरीके, 20 गुना तक बढ़ जाएगा उत्पादन

Moong Dal Cultivation Tips: मूंग की खेती में आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक बीजों का इस्तेमाल कर किसान अब अपनी पैदावार में भारी बढ़ोतरी कर सकते हैं. सही सिंचाई और सही खाद से मुनाफा बढ़ेगा.

Moong Dal Cultivation Tips:  खाने में हर किसी को मूंग की दाल पसंद होती है. लेकिन किसान भाइयों के लिए यह मुनाफे की मशीन बन सकती है. अक्सर पारंपरिक तरीकों से खेती करने पर पैदावार वैसी नहीं मिल पाती जिसकी उम्मीद होती है. लेकिन अगर आज के दौर की तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों को अपना लिया जाए. तो मूंग का उत्पादन 20 गुना तक बढ़ाया जा सकता है. 

इसमें सबसे जरूरी है बीज का सही चुनाव, मिट्टी की सेहत का ख्याल और समय पर सिंचाई का सटीक मैनेजमेंट. मूंग की खेती न केवल कम समय में तैयार होती है. बल्कि यह मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ाती है. चलिए आपको बताते हैं वो तरीके जो आपकी फसल को लहलहा देंगे.

ऐसे करें मूंग की खेती 

खेती की शुरुआत ही बीज से होती है.इसलिए हमेशा ऐसी किस्मों का चुनाव करें जो पीला मोजेक वायरस जैसी बीमारियों से लड़ सकें. स्टार 444 जैसी किस्में आजकल काफी पॉपुलर हैं जो महज 60-65 दिनों में तैयार हो जाती हैं. बुवाई से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर या थाइराम से ट्रीट जरूर करें.

जिसस शुरुआती दौर में जड़ गलन की समस्या न आए. बुवाई के समय कतारों के बीच की दूरी लगभग 25 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 10 सेंटीमीटर का गैप रखें. यह गैप हर पौधे को धूप और हवा दिलाता है. जिससे फलियों की संख्या में भारी इजाफा होता है और पैदावार बढ़ती है.

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मिट्टी और खाद का रखें ध्यान

आजकल की मॉडर्न फार्मिंग में केवल यूरिया पर निर्भर रहना पुरानी बात हो गई है. मूंग की फसल खुद मिट्टी में नाइट्रोजन फिक्स करती है. इसलिए इसे नाइट्रोजन की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती. इसके बजाय सिंगल सुपर फास्फेट (SSP) और जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करें. जो फलियों की चमक और दाने का वजन बढ़ाते हैं. 

बुवाई के समय डीएपी (DAP) का इस्तेमाल भी मिट्टी की ताकत बढ़ाता है. अगर आप जैविक तरीके अपनाना चाहते हैं, तो वर्मी कंपोस्ट और नीम की खली मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में जादू की तरह काम करती है. मिट्टी का पीएच (pH) लेवल 6.5 से 7 के बीच रखना सबसे बेस्ट रहता है.

इन बातों का भी रखें ध्यान

मूंग की फसल को पानी की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं होती. लेकिन सही वक्त पर नमी मिलना जरूरी है. पहली सिंचाई बुवाई के करीब 20-25 दिन बाद करें और दूसरी जब फूल आने लगें. ध्यान रहे कि ज्यादा पानी से फलियां एक साथ नहीं पकतीं. इसलिए सिंचाई में संतुलन रखें. 

कीड़ों और बीमारियों से बचाव के लिए आधुनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करें. खासकर सफेद मक्खी और थ्रिप्स पर नजर रखें. क्योंकि ये वायरस फैलाते हैं. अगर आप सही समय पर खरपतवार निकाल देते हैं और कीटों का छिड़काव करते हैं. तो आपकी फसल सुरक्षित रहेगी.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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