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मक्का और सोयाबीन की बंपर पैदावार के लिए नौतपा में करें खेत की गहरी जुताई, बढ़ेगी मिट्टी की ताकत

Nautapa Farming Tips: नौतपा की भीषण गर्मी में मक्का और सोयाबीन के खेतों की गहरी जुताई करने का सबसे सही वैज्ञानिक तरीका. मिट्टी को ताकतवर बनाने के तरीके जान लें.

Nautapa Farming Tips: गर्मियों के मौसम में जब नौतपा की भीषण गर्मी पड़ती है तो ज्यादातर लोग घरों में दुबक जाते हैं. लेकिन हमारे किसान भाइयों के लिए यह अपनी मिट्टी को और ज्यादा उपजाऊ और ताकतवर बनाने का सबसे सुनहरा मौका होता है. मक्का और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों से अगर आप रिकॉर्ड तोड़ पैदावार चाहते हैं. तो इस तपती धूप में अपने खेतों की गहरी जुताई करना बिल्कुल न भूलें. 

नौतपा के दौरान सूर्य की सीधी और तेज किरणें जमीन के अंदर तक पहुंचती हैं, जिससे मिट्टी को एक नई एनर्जी मिलती है. इस समय की गई थोड़ी सी मेहनत आपकी आने वाली फसल की किस्मत बदल सकती है. चलिए जानते हैं कि इस भीषण गर्मी में खेत को तपाना क्यों जरूरी है और इससे आपकी फसलों को क्या-क्या बड़े फायदे होने वाले हैं.

नौतपा में गहरी जुताई करने का सही तरीका 

नौतपा के दौरान जब तापमान अपने चरम पर होता है. तब खेतों की जुताई के लिए मिट्टी पलटने वाले हल या कल्टीवेटर का इस्तेमाल करना चाहिए. खेत की करीब 10 से 12 इंच गहरी जुताई करके मिट्टी को ऊपर-नीचे कर दें जिससे नीचे की मिट्टी को अच्छी धूप मिल सके. इस प्रोसेस से मिट्टी के अंदर दबे हानिकारक कीड़े-मकोड़े. 

उनके अंडे और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले फंगस तेज धूप के कारण पूरी तरह खत्म हो जाते हैं. इसके साथ ही खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेष और जिद्दी खरपतवार भी सूखकर नष्ट हो जाते हैं. यह गहरी जुताई एक तरह से आपके खेत का नेचुरल प्यूरीफिकेशन करती है जिससे आने वाली मक्का और सोयाबीन की फसलों को पूरी सुरक्षा मिलती है.

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मक्का और सोयाबीन की बंपर पैदावार 

इस खास समय पर गहरी जुताई करने से मक्का और सोयाबीन की फसलों को सीधा और तगड़ा फायदा पहुंचता है. धूप लगने से मिट्टी एकदम भुरभुरी हो जाती है, जिससे इसकी वॉटर होल्डिंग कैपेसिटी यानी पानी सोखने की क्षमता काफी बढ़ जाती है. मानसून की पहली बारिश होते ही पानी जमीन के अंदर तक जमा हो जाता है. जो पौधों की जड़ों को लंबे समय तक नमी देता है. 

मक्का और सोयाबीन की जड़ें जमीन में गहराई तक जाती हैं और भुरभुरी मिट्टी होने की वजह से उन्हें फैलने के लिए पूरा स्पेस और भरपूर ऑक्सीजन मिलती है. इसके अलावा मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्व एक्टिव हो जाते हैं जिससे बिना ज्यादा केमिकल खाद डाले ही आपको फसलों का बंपर प्रोडक्शन देखने को मिलता है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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