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अल नीनो का असर इस बार फसल को कर देगा बर्बाद? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

El Nino Effect On Agriculture: अल नीनो के बढ़ते डर के बीच हर किसान इस साल अपनी फसलों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है. जान लें इस मौसमी आफत का सामना करने के लिए एक्सपर्ट्स के टिप्स.

El Nino Effect On Agriculture: देश के कुछ हिस्सों में बारिश हो रही है तो वहीं कुछ हिस्सों में अब तक गर्मी ने लोगों को परेशान कर के रखा है. खेती में खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है इस दौरान फसलों के लिए बारिश बहुत जरूरी है. देश में इस बीच अल नीनो का साया भी मंडरा रहा है कई किसानों के मन में एक ही बड़ा डर छाया हुआ है कि क्या अल नीनो इस पूरे सीजन की मेहनत पर पानी फेर देगा. हर कोई यही जानना चाहता है कि क्या वाकई इस साल फसलें पूरी तरह तबाह होने वाली हैं. 

आपको बता दें जून के महीने में सामान्य से करीब 43 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है. जिसने धान, मक्का, दाल और कपास की बुवाई करने वाले किसानों को चिंता में डाल दिया है. मौसम में आ रहे इस बदलाव ने खेती का पूरा हिसाब बिगाड़ दिया है.  क्या अल नीनो को इस बार पूरी फसल बर्बाद कर देगा जान लीजिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स. 

अल नीनो का फसलों पर संकट 

विशेषज्ञों के मुताबिक अल नीनो का सबसे ज्यादा नुकसान उन इलाकों में होता है जहां खेती पूरी तरह मॉनसून के भरोसे चलती है. इस बार देश के लगभग 315 जिलों को संवेदनशील माना गया है जिनमें से 111 जिलों में सिंचाई की सुविधाएं बेहद कम हैं. दलहन और तिलहन जैसी फसलों को समय पर पानी न मिलने से उत्पादन घटने का डर सबसे ज्यादा रहता है. 

वहीं देश के कृषि मंत्री ने भी भरोसा दिलाया है कि वे हर जिले के लिए एक बैकअप प्लान तैयार रख रहे हैं जिससे चारे और पानी की किल्लत न हो. हालांकि जो किसान आधुनिक तकनीकों और कम पानी में उगने वाले मोटे अनाजों यानी मिलेट्स की तरफ बढ़ रहे हैं उनपर इस सूखे से का ज्यादा असर नहीं होगा.

यह भी पढ़ें: ज्यादा बारिश से फसल खराब हो जाने पर प्रति बीघा कितना मुआवजा देती है सरकार?

एक्सपर्ट्स की राय

एक्सपर्ट्स का मानना है कि फसलों के कमजोर उत्पादन का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ सकता है क्योंकि इससे आने वाले दिनों में खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं. मॉनसून में देरी और अल नीनो के डर की वजह से ट्रैक्टरों की बिक्री और ग्रामीण इलाकों में लोगों की खरीदारी की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी है.

फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि भारतीय कृषि अब पहले जैसी कमजोर नहीं है. क्योंकि हमारे पास मजबूत सिंचाई नेटवर्क और बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणालियां मौजूद हैं. एक्सपर्ट्स किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वह मौसम की सटीक जानकारी देखकर ही खेतों में बीज डालें और सरकार की गाइडलाइंस का पालन करें.

यह भी पढ़ें: फार्म हाउस पर कैसे उगाएं सिवनी का जम्बो सीताफल? 1 किलो तक होता है वजन

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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