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होर्मुज पर 20 प्रतिशत टोल लगने से क्या किसानों पर पड़ेगा कोई असर, यहां जान लें काम की बात

Strait of Hormuz:होर्मुज रूट पर 20% टोल लगाने का डोनाल्ड ट्रंप का फैसला फिलहाल वापस हो गया है. अगर यह लागू होता किसानों पर कितना असर पड़ता जान लीजिए.

Strait of Hormuz: पिछले कुछ वक्त से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दुनिया भर में हलचल बनी हुई है. पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यहां से गुजरने वाले कार्गो जहाजों पर 20 प्रतिशत टोल लगाने का प्रस्ताव रखा था. इस ऐलान के बाद तेल बाजार से लेकर शिपिंग कंपनियों तक हर जगह चिंता बढ़ गई.

 क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है. हालांकि बाद में ट्रंप ने यह प्रस्ताव वापस ले लिया.इसके बाद बाजार में कुछ राहत जरूर देखने को मिली. लेकिनम अगर यह फैसला लागू हो जाता तो इसका असर सिर्फ तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता. जान लीजिए इस तरह के फैसले का किसानों की जेब पर क्या असर पड़ सकता था.

डीजल के दाम और खेती की लागत पर तगड़ी मार

होर्मुज रूट से दुनिया का करीब एक-तिहाई कच्चा तेल गुजरता है. अगर ट्रंप प्रशासन इस रास्ते पर 20% का भारी-भरकम टोल लगा देता. तो तेल कंपनियों के लिए माल ढुलाई का खर्च अचानक बहुत बढ़ जाता. नतीजा यह होता कि भारत आने वाला कच्चा तेल महंगा हो जाता और देश में डीजल की कीमतें आसमान छूने लगतीं. 

भारतीय खेती में डीजल का रोल सबसे बड़ा है चाहे ट्रैक्टर से खेतों की जुताई करनी हो, ट्यूबवेल या पंपसेट से फसलों की सिंचाई करनी हो या फिर तैयार माल को ट्रैक्टर-ट्रॉली से मंडियों तक पहुंचाना हो. डीजल महंगा होने से किसानों का हर काम पर होने वाला खर्च सीधे बढ़ जाता. जिससे खेती की लागत बहुत महंगी हो जाती.

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खाद का संकट बढ़ने से खेती पर बुरा असर पड़ता

डीजल के अलावा इस टोल का दूसरा सबसे बड़ा झटका खाद सेक्टर को लगता. भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा, खासकर यूरिया, डीएपी और खाद बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल खाड़ी देशों से ही मंगाता है. होर्मुज पर 20% एक्स्ट्रा चार्ज लगने से ये जरूरी खादें भारत लाना न सिर्फ महंगा हो जाता.

बल्कि जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से समय पर खाद की सप्लाई भी रुक सकती थी. ऐसे में ऐन बुवाई के सीजन में बाजार में खाद की भारी किल्लत हो जाती या फिर किसानों को ब्लैक में महंगी खाद खरीदनी पड़ती. राहत की बात यही है कि ट्रंप के फैसला बदलने से फिलहाल भारत के किसान इस बड़े आर्थिक बोझ से बच गए हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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