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White Hydrogen: फ्यूचर एनर्जी का सोर्स कैसे बन सकता है व्हाइट हाइड्रोजन, आखिर यह क्या बला है?
White Hydrogen: व्हाइट हाइड्रोजन को भविष्य की साफ और सस्ती ऊर्जा के रूप में देखा जा रहा है. यह धरती के अंदर प्राकृतिक रूप से बनने वाली गैस है, जो आने वाले समय में ऊर्जा का बड़ा विकल्प बन सकती है.

प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत
Source : pexels
White Hydrogen: आज दुनिया में ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है और इसी बीच एक नया नाम काफी चर्चा में है व्हाइट हाइड्रोजन. इसे “नेचुरल हाइड्रोजन” भी कहा जाता है. यह धरती के अंदर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला हाइड्रोजन है, जिसे बनाने के लिए किसी फैक्ट्री या भारी प्रोसेस की जरूरत नहीं होती. यही इसकी सबसे खास बात है. यह जमीन के नीचे चट्टानों और प्राकृतिक गैस भंडार के बीच खुद-ब-खुद बनता रहता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इसे सही तरीके से खोजा और इस्तेमाल किया जाए, तो यह आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल और गैस का मजबूत विकल्प बन सकता है.
यह कैसे बनता है और कहां मिलता है?
व्हाइट हाइड्रोजन किसी केमिकल फैक्ट्री में नहीं बनता, बल्कि यह धरती के अंदर चलने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बनता है. जब पानी और कुछ खास तरह की चट्टानें आपस में मिलती हैं, तो हाइड्रोजन गैस बन सकती है. यह गैस फिर जमीन के नीचे फंस जाती है और धीरे-धीरे जमा होती रहती है. इसे खोजने के लिए खास तरह की ड्रिलिंग और रिसर्च की जरूरत होती है. कुछ देशों जैसे फ्रांस, अमेरिका और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इसके बड़े भंडार मिलने की बात सामने आई है. हालांकि भारत में अभी इस पर रिसर्च शुरुआती स्तर पर है, लेकिन संभावना काफी बड़ी मानी जा रही है.
फ्यूचर एनर्जी के लिए क्यों खास माना जा रहा है?
व्हाइट हाइड्रोजन को फ्यूचर एनर्जी इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह जलने पर सिर्फ पानी बनाता है और इसमें कार्बन डाइऑक्साइड या प्रदूषण नहीं होता. इसका मतलब यह है कि यह पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता. आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण से परेशान है, तब ऐसी ऊर्जा बहुत जरूरी हो जाती है. इसके अलावा इसे बनने के लिए बिजली या बड़े कारखानों की जरूरत भी नहीं पड़ती है, वहीं इससे लागत भी कम होता है. अगर इसका सही इस्तेमाल शुरू हो जाए तो यह बिजली उत्पादन, गाड़ियों और फैक्ट्रियों में बड़े बदलाव ला सकता है.
चुनौतियां और आने वाला भविष्य
हालांकि व्हाइट हाइड्रोजन जितना सुनने में आसान लगता है, उतना ही इसे निकालना और इस्तेमाल करना मुश्किल भी होता है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके भंडार ढूंढना आसान नहीं है और अभी इसकी तकनीक पूरी तरह विकसित नहीं हुई है. इसके अलावा इसे सुरक्षित तरीके से स्टोर और ट्रांसपोर्ट करना भी एक बड़ा काम है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले 10–20 सालों में अगर इस पर सही निवेश और रिसर्च हुई, तो यह दुनिया की सबसे सस्ती और साफ ऊर्जा बन सकती है. कई वैज्ञानिक इसे “एनर्जी का गोल्डन फ्यूचर” भी कह रहे हैं.
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