क्यों एंड्रॉयड और IOS पर ही चलते हैं सभी फोन, दूसरी कंपनी क्यों नहीं डालती इसमें हाथ?
क्या कभी सोचा है कि दुनिया भर की बड़ी कंपनियां होने के बावजूद कोई तीसरी कंपनी अपना फोन ऑपरेटिंग सिस्टम क्यों नहीं ला पाती? इसके पीछे कौनसी वजहें हैं जान लीजिए इस खबर में.

- स्मार्टफोन बाजार में Android और iOS ऑपरेटिंग सिस्टम का पूरा प्रभुत्व है.
- ज़रूरी ऐप्स और डेवलपर समर्थन के बिना नया ऑपरेटिंग सिस्टम लाना मुश्किल है.
- Google-Apple के एकाधिकार ने Microsoft जैसे दिग्गजों के प्रयास भी विफल किए.
- यूज़र्स की आदतें और विशेष हार्डवेयर अनुकूलन नए OS की बड़ी बाधा है.
अगर आज आप बाज़ार में नया स्मार्टफोन खरीदने निकलें तो चाहे आपके हाथ में 50 हज़ार का फोन हो या 1.5 लाख का, स्क्रीन ऑन होते ही या तो Android का लोगो दिखेगा या फिर Apple का कटा हुआ सेब. ज़रा सोचिए जब दुनिया में इतनी बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां बैठी हैं. तो फिर कोई तीसरी कंपनी अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम लाकर इस एकाधिकार को क्यों नहीं तोड़ पा रही है. क्या किसी में दिमाग या पैसों की कमी है. आखिर ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है.
तो आपको बता दें मोबाइल इंडस्ट्री इसे कोई भी आसानी से बदलना नहीं चाहता. हर कोई इस बात से वाकिफ है कि Smartphone का बाज़ार पूरी तरह से इन दो दिग्गज OS के इर्द गिर्द नाचता है. लेकिन इसके पीछे की टेक्निकल और बिजनेस मजबूरियां इतनी बड़ी हैं कि कोई भी नया खिलाड़ी मैदान में उतरने से पहले हजार बार सोचता है. यही वजह है कि आज भी लोग इन्हीं दोनों प्लेटफॉर्म्स के बीच सिमट कर रह गए हैं और दूसरी कंपनियों के लिए इस नया OS ला पाना लगभग नामुमकिन सा है. चलिए आपको बताते हैं आखिर कौन सी वजहें और हैं इसके पीछे.
Operating System तो बन जाएगा लेकिन चलाएगा कौन?
आज के दौर में सिर्फ एक बढ़िया Operating System बना लेना कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं है. बड़ी-बड़ी कंपनियां चाहें तो कोडिंग करके एक नया सॉफ्टवेयर तैयार भी कर लें लेकिन आज हर यूज़र को फोन में WhatsApp, Inagramst, Youtube, Google Maps और UPI ऐप्स चाहिए. यह सारी कंपनियां करोड़ों खर्च करके सिर्फ एंड्रॉयड और iOS के लिए ही अपने ऐप को Optimize करती हैं. अगर कल कोई नई कंपनी अपना OS ले भी आए तो उस पर यह काम के ऐप्स चलेंगे ही नहीं.
लोग ऐसा फोन क्यों खरीदेंगे जिसमें ढंग का Social Medai और Banking ऐप ही न चले. यही वह वजह है कि जो नए Operating System को आने से रोक रहा है. बिना मजबूत App Support के कोई भी नया सिस्टम मार्केट में टिक नहीं सकता और यही सबसे बड़ी वजह कही जा सकती है. इसके अलावा Developers भी किसी नए Operating System के लिए अलग से मेहनत करने में अपना वक्त और पैसा बर्बाद नहीं करना चाहते. क्योंकि उन्हें पता है कि वहां उनका यूजर बेस जीरो के बराबर होगा और उन्हें कोई खास रिटर्न नहीं मिलने वाला है.

Google और Apple का ऐसा कब्जा कि पत्ता भी न हिले
इसके इतर अगर दूसरी वजह की बात करें तो इन दोनों दिग्गजों की भयंकर मोनोपॉली और पैसे का ऐसा खेल है. जिससे मुकाबला करना नामुमकिन सा हो गया है. Android को गूगल ने लगभग हर फोन कंपनी को मुफ्त में दे रखा है जिससे बाकी ब्रांड्स का खुद का OS बनाने का खर्चा और सिरदर्द बच जाता है. वहीं Apple अपने iOS को किसी दूसरे को देता ही नहीं. वह हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों बेचकर मोटा मुनाफा कमाता है. Microsoft और Blackberry जैसी दिग्गज कंपनियां भी इस रेस में अपना दम दिखा चुकी हैं और करोड़ों रुपये डुबाकर मैदान से बाहर हो चुकी हैं.
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जब Microsoft जैसा महारथी Windows फोन नहीं टिका पाया तो कोई छोटी या नई कंपनी रिस्क लेने की हिम्मत कैसे करे. यही वजह है कि आज कोई भी Tech ब्रांड इस डायरेक्शन में पैर रखने से सौ बार कतराता है. क्योंकि Google और Apple का जाल इतना फैला हुआ है कि हर तरफ उन्हीं का सिक्का चलता है. इन दोनों कंपनियों ने इतने पेटेंट और कानूनी घेरे बना रखे हैं कि अगर कोई नकल करने की कोशिश भी करे तो उसे करोड़ों के मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है.

Users का बड़ा बेस
हम सब Android या iOS के Features, Shortcut और Settings के ऐसे आदी हो चुके हैं कि अगर कोई नया Interface सामने आ जाए तो हमें वu इस्तेमाल करने में थोड़ी परेशानी होगी. इसके अलावा फोन के अंदर के Sensors, Processor और Chipset इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि वह सिर्फ इन दोनों Software के साथ ही अच्छे से काम करें. इस तरह का Hardware और Softwareकिसी भी नई कंपनी के लिए बनाना और उसे अच्छे से चलाना और टिकाए रहना बहुत ही मुश्किल काम है. इसलिए आज भी लगभग सभी Phones इन दोनों सिस्टम पर चलते नजर आते हैं.
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